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बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2012

म.प्र. को तत्काल आर्थिक सुधारों की जरूरत

मध्य प्रदेश के 2012-13 के बजट में संसाधनों और साहस की कमी। रियायतों को अगले बजट के लिए रिजर्व रखा ।


जयप्रकाश पाराशर 


मध्य प्रदेश होने को तो  देश के बीचों बीच है, जहां से पूरे मुल्क का पारगमन होना चाहिए, कई प्रमुख राजमार्ग यहां से गुजरने चाहिए, समान दूरियों को देखते हुए इसे मैन्युफैक्चरिंग का हब होना चाहिए। समसीतोष्ण जलवायु, जंगल, प्रचुर खनिज और सस्ती जमीन इसे दशकभर में देश का उन्नत राज्य बना सकते हैं। लेकिन मानव सूचकांकों की जितनी भी सूचियां जारी होती हैं, उनमें यह नीचे से अव्वल है। मध्य प्रदेश का बजट  2012-13 इस बात की तस्दीक करता है कि मानव सूचकांकों की इन सूचियों में लोगो की स्थिति जल्दी सुधरने वाली नहीं।

भोपाल में अंग्रेजी के एक अखबार ने अपनी हैडलाइन में इसे "पोलसेंट्रिक बजट" (यानी चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया बजट) कहा है। शक्कर, कपड़ा, सीमेंट, बिजली और डीजल जैसी आम उपभोग की वस्तुओं पर टैक्स लगाकर आप चुनाव में जीतना चाहते हैं तो यह आपका अति आत्मविश्वास ही कहा जाना चाहिए।  दरअसल प्रदेश में चुनाव दिसंबर 2013 में हैं और वित्तमंत्री ने रियायतों को अगले साल के बजट के लिए रिजर्व रखा है। यानी लोकलुभावन घोषणाएं अगले साल होंगी।

टैक्स का गणितः

राघवजी को जब वित्तमंत्री बनाया जा रहा होगा तो उनके लंबे राजनीतिक अनुभव के अलावा शायद यह बात भी ध्यान में रखी गई होगी कि वह टैक्स के अच्छे वकील रहे हैं। फिलहाल टैक्स के बारे में उनकी यह जानकारी जनता को भारी पड़ गई है। इससे दो समस्याएं पैदा हुई हैं।

एक,  ऱाघवजी राजकोषीय गाइडलाइन का बड़ी सख्ती से पालन करते हैं। राजकोषीय घाटे की गाइडलाइन अगर 3 फीसदी मुकर्रर है तो उन्होंने उसे 2.98 फीसदी पर सीमित कर दिया है। अब मध्य प्रदेश कोई ऐसा विकसित राज्य तो है नहीं कि खर्च करना बंद कर दे और ओवरड्राफ्ट कम होने की खुशियां मनाएं। राघवजी को आयोजना व्यय बढ़ाने चाहिए थे। शायद अगले साल वे ज्यादा खर्च करना चाहते हैं।

दूसरी,  उनके कर प्रस्ताव ऐसे हैं जो आम आदमी की जेब से ज्यादा धन निकाल लेते हैं।  मसलन शक्कर और कपड़ा पर कहने के लिए उन्होंने टैक्स का रीप्लेसमेंट किया है। अर्थात एडीशनल एक्साइज के स्थान पर 5 फीसदी वैट लगाकर वे 150 करोड़ रुपए हासिल करना चाहते हैं। असलियत यह है कि मध्य प्रदेश में बिकने वाली 95 फीसदी शक्कर पर इस वैट के अलावा सीएसटी और प्रवेश कर भी लगेंगे। इससे जहां कर चोरी बढ़ेगी, वहीं आम उपभोक्ता को महंगाई का सामना करना पड़ेगा। कपड़े का भी यही हाल है।

शक्कर और कपड़े पर वैट लगाने का सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि मध्य प्रदेश की कनफेक्शनरी और गारमेंट उद्योगों की लागत बढ़ जाएगी। उन्हें शक्कर व कपड़ा उत्पादक राज्यों के निर्माताओं के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे। दोनों ही उद्योग लघु उद्योगों की श्रेणी में हैं।

मध्य प्रदेश में रीयल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन उद्योग प्रमुख हैं। इन्हें महंगी सीमेंट का सामना करना पड़ेगा।

बिजली के उत्पादन और वितरण पर पांच फीसदी वैट लगाने से कृषि, उद्योगों की इनपुट लागत में इजाफा होगा। इसी तरह डीजल भी महंगा पड़ेगा। इसका असर किसानों की लाभप्रदता में कमी के रूप में दिखाई देगा।

समस्या यह है कि किसी राज्य का वित्तमंत्री वैट या बिक्री कर नहीं लगाए तो आर्थिक संसाधन जुटाए कहां से?

विकास का गणितः 

बिजली और सड़क के मुद्दों पर दिग्विजयसिंह सत्ता से बाहर हुए थे। यह बात शिवराज सिंह चौहान भूले नहीं हैं। प्रस्तावित बजट में बिजली और सड़कों पर काफी प्रावधान किए गए हैं। नई बिजली परियोजनाओं में 384 करोड़ रुपए राज्य सरकार अंशपूंजी के रूप में देगी। वहीं सड़कों के विकास के लिए  4694 करोड़ का प्रावधान किया गया है। पंचायत और ग्रामीण विकास पर भी 6913 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

इन सारे प्रावधानों के पीछे यही सोच दिखाई देती है कि 2013 के चुनावों तक इन परियोजनाओं को किसी तरह अमल में लाया जाकर विकास को कम से कम दिखने लायक तो बनाया जाए।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रावधान अपर्याप्त कहे जा सकते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य का मानव सूचकांकों से गहरा नाता है। लोगों की स्किल या दक्षताओं के विकास पर खर्च करने में सरकार को कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

उद्योगों पर फोकस नहींः 

नौ नए औद्योगिक क्षेत्र बनाने के लिए 10 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। समझ से बाहर है कि सरकार 10 करोड़ रुपए में 9 औद्योगिक क्षेत्र कैसे बना देगी। यह भी समझ से बाहर है कि पांच औद्योगिक क्षेत्रों का उन्नयन 10 करोड़ रुपए में कैसे किया जाएगा और उन्हें क्या बनाया जाएगा। मध्य प्रदेश में बंद पड़े उद्योगों की बड़ी तादाद है।

ऐसा ही एक हास्यास्पद प्रावधान जैविक खेती का है, जिस पर 2.8 करोड़ खर्च किए जाएंगे। यदि इसमें से 25 फीसदी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया तो दो करोड़ रुपए तो केवल सत्ताधारी दल के दो-चार नेताओं के खेतों पर ही खर्च हो जाएंगे। जाहिर है जैविक खेती सरकार के एजेंडे मे महज शोशेबाजी के लिए है। खेती की विकास दर को राष्ट्रीय विकास दर से ज्यादा बताया जा रहा है।  खोज का विषय है कि किसानों को आत्महत्याएं क्यों करनी पड़ रही हैं?