दुनिया की हर शै पर किसी न किसी की छाप है। हर शख्स कहीं न कहीं से। किसी ने पढ़ी किताबें। कोई मां-बाप से सीखा हुआ। किसी के जीन ने उसे ऐसा बना दिया है। किसी को अनुभवों ने घिसघिसाकर कोने ख़त्म कर दिए, कोई भीतर से लहूलुहान है। किसी ने कोई दुःख नहीं देखा तो कोई जिंदगी को महज़ समय समझता है। किसी के लिए यह मुश्किलों से भरी दास्तान है।
लिहाजा सबके अपने आग्रह हैं।
फ्रॉम नोव्येहर कोई नहीं
फ्रॉम नोव्येहर कुछ नहीं
न कुछ पूरी तरह इलूजन है और न रीयलिटी
सृष्टि में जो कुछ भी
जो है और जो दीखता है, उसके बीच कहीं
विभ्रम और यथार्थ के बीच कहीं
इसलिए जो कुछ भी लिखा जाएगा
इलूजन और रीयलिटी के बीच कहीं
जो कहा जाएगा,
वो होगा जो शब्द से समझा जाएगा
फ्रॉम नोव्हेयेर कुछ भी नहीं
फ्रॉम नोव्येहर कोई भी नहीं