गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

भारत की जलनीति-2012 में आम-आदमी कहां है?


जल को आर्थिक संसाधन की तरह देखने का समय आया, नदियों-तालाबों पर स्पष्ट नजरिए की दरकार

जयप्रकाश पाराशर

सरकार ने राष्ट्रीय जल नीति 2002’ के दस साल बाद राष्ट्रीय जल नीति 2012’ का मसौदा प्रारूप लोगों के सुझावों के लिए वेबसाइट पर डाला था। यह जनता की राय लेने का कर्मकांड है। अंत में बाबुओं की राय ही देश की राय बन जाएगी, क्योंकि मुझे अंदेशा है कि पेयजल संकट झेलने वाले आम आदमी को पता भी नहीं चला होगा कि उसकी जलनीति बन चुकी है, जिसमें वो खुद कहीं नहीं है। इस मुल्क की एक फीसदी जनसंख्या ने भी सरकार की जलनीति का यह मसौदा नहीं पढ़ा होगा। सरकार को यह मसौदा अखबारों में छापकर राय लेनी चाहिए थी।

नदी-तालाब की चिंता नहीं
मसौदे में जहां समाज के सक्षम तबके से जल उपयोग के बदले तर्कसम्मत दरें वसूलने की बात कही गई है, वहीं इस बात की कोई चिंता नहीं है कि देश के नदी-तालाब खत्म हो रहे हैं, उनके कैचमेंट एरिया नष्ट किए जा रहे हैं, उसे बचाने के लिए क्या किया जाए, पैसा कहां से लाया जाए। यदि आप जल संसाधन से धन अर्जित कर रहे हैं तो उसका इस्तेमाल भी जल संसाधन के बचाव में होना चाहिए।


संघर्ष की आशंका
जलनीति-2012 का मसौदा यह चेतावनी तो देता है कि भविष्य में जल को लेकर समाज में तनाव पैदा हो सकता है, क्योंकि नई जीवनशैली में जल का उपयोग बढ़ रहा है। औद्योगिक विकास को जल चाहिए। भारत में दुनिया की 17 फीसदी जनसंख्या है लेकिन नवकरणीय जल संसाधन केवल 4 फीसदी है। औद्योगिक संसार में भी पानी के पुनरचक्रीकरण (रीसाइक्लिंग) को बढ़ावा देने की कोई चिंता नहीं है। शायद इसलिए ही यह नीति कह रही है कि भविष्य में विभिन्न पक्षों के बीच संघर्ष हो सकता है।

यहां मेरे मन में एक प्रश्न आता है कि यह नीति कौन से विभिन्न पक्षों में संघर्ष की बात कर रही है? एक पक्ष, साधारण आदमी है जिसे पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए जल चाहिए। दूसरा पक्ष, कृषि है जो अभी ताजा जल का 80 फीसदी इस्तेमाल कर रहा है और उसे अच्छी गुणवत्ता का पानी चाहिए। तीसरा पक्ष, उद्योग हैं, जिन्हें विकास की गति बढ़ानी है तो जल के बिना संभव नहीं है। चौथा पक्ष, ऊर्जा क्षेत्र है, जिसे जल संसाधनों की व्यापक दरकार होगी।

क्या आम आदमी कृषि उत्पादन और औद्योगिक विकास के बगैर रह सकता है? तय समझिए कि जल के उपयोग और आवंटन में अब सामाजिक न्याय और समानता का सिद्धांत जल्द ही उठने वाला है।


पर्यावरण और जल
मसौदे ने पर्यावरणीय और जलवायु परिवर्तनों से जल पर पड़ने वाले प्रभाव का जिक्र किया है। मसलन, समुद्र सतह का स्तर उठ रहा है,  भूमिगत जल और सतह के जलस्रोत घट रहे हैं या खारे हो रहे हैं,  तटों का डूबना और बारिश की मात्रा में व्यापक अंतर के साथ ही बाढ़ और जमीन के कटाव तथा सूखे की समस्याएं ऐसी पर्यावरणीय समस्याएं हैं, जो ताजा जल की उपलब्धता को प्रभावित करती है। जल चक्र के सभी घटक वाष्पोत्सर्जन, वर्षण, अपवाह, नदी, झीलें, मृदा आदि पूरे तंत्र को बचाने की जरूरत है।

कैसे हो जल प्रबंधन
जल प्रबंधन के लिए आवश्यक है कि आर्थिक लाभ और दंड दोनों का प्रयोग किया जाए। आमतौर पर जल को राज्यों का विषय बनाया गया है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत ढांचा बनाने की जरूरत है जो राज्यों की मदद कर सके। छोटे बंधे आदि बनाकर अत्यंत लघु और स्थानीय स्तर की जल सुविधाओं का विकास किए जाने की जरूरत है।

जलनीति-2012 का मसौदा बताता है कि जल को अब आर्थिक वस्तु की तरह देखने का समय आ गया है। इससे जल का सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। लोग जल का इस्तेमाल मितव्ययिता के साथ करने लगेंगे।

सबसे अहम बात यह सामने आई है कि नदी, झीलों, टैंक, नालियों आदि जल प्रणालियों पर अतिक्रमण नहीं होने देना चाहिए और जहां तक संभव हो ऐसे अतिक्रमणों को इस स्तर तक वापस किया जाना चाहिए जो व्यावहारिक रूप से संभव हो। जल प्रबंधन की शिक्षा को अब पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए और उच्च स्तर पर जल प्रबंधन के पेशेवर लोग तैयार किए जाने चाहिए।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

हांफती तरक्की के भद्दे कलर विज्ञापन

नौ फीसदी विकास दर वाले देश के 42 फीसदी बच्चे कुपोषित और 7 फीसदी लोग मजे में

जयप्रकाश पाराशर


कुछ दिनों पहले हंगर एंड मालन्यूट्रीशन इन इंडिया (हंगामा) की रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘राष्ट्रीय शर्म’ का अनावरण किया था। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान औसत 8.2 फीसदी की विकास दर हासिल करने और बारहवीं योजना (2012-17) में 9 फीसदी का लक्ष्य रखने वाले देश के सौ जिलों में 42 फीसदी बच्चे अंडरवेट पाए गए। 66.3 फीसदी मांओं ने कहा कि वे कभी स्कूल नहीं गईं। सौ फीसदी मांओं ने कहा कि उनके घर में साबुन है, लेकिन केवल 19 फीसदी मांओं ने कहा कि उनके बच्चे टायलट जाने के बाद हाथ धोते हैं।
देश के सबसे खराब माने गए इन सौ जिलों में से 40 उत्तर प्रदेश में हैं जहां मायावती से कांग्रेस का विधानसभा संग्राम चल रहा है, 22 बिहार के हैं, जहां नीतीशकुमार लगातार दूसरी बार सत्ता में चुने गए, 12 मध्य प्रदेश में है, जहां शिवराज सिंह लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रहे, 5 जिले उड़ीसा में हैं, जहां नवीन पटनायक लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रहे, 15 जिले झारखंड में हैं, जहां कोई भी सरकार कभी पांच साल पूरे नहीं कर पाई और इनमें से एकमात्र कांग्रेसशासित राजस्थान के 10 जिले हैं। फिर भी यह राष्ट्रीय विषय है, भले ही शर्म का है।

विकास के विरोधाभासः

देश की कुल आबादी में 70 फीसदी महिलाएं और बच्चे हैं। इनमें 66.3 फीसदी माताओं ने कभी स्कूल नहीं देखा और 42 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

फिर भी योजना आयोग पता नहीं क्यों अगले पांच साल में 9 फीसदी विकास दर का लक्ष्य लेकर चल रहा है। नौ फीसदी विकास दर का अर्थ है कि आपका जीडीपी केवल नौ साल में दोगुना हो जाएगा। हम यह कैसी तरक्की कर रहे हैं? आर्थिक विकास दर का अंतिम लक्ष्य है समाज के सदस्यों के जीवन स्तर में सुधार लाना।

आंकड़े बता रहे हैं कि केवल 7 फीसदी लोग अच्छे जीवन का आनंद उठा रहे हैं।

गरीबी बढ़ा रहे ऊंचे वेतनः

हर साल कंपनियों के बड़े अधिकारियों और आईआईएम से निकलने वालों के वेतन बढ़ने की खबरें आ रही हैं। इनके वेतन हर साल 12-15 फीसदी तक बढ़ रहे हैं। इसका अर्थ है कि मुद्रास्फीति का बढ़ना। उनकी डिस्पोजेबल इनकम केवल खाद्य पदार्थों की कीमतें ही नहीं बढ़ा रही बल्कि मुद्रास्फीति के कारण हर साल गरीबों की संख्या बढ़ती जाती है। अनाज की कीमतें बढ़ने के कारण ऐसे गरीबों की तादाद बढ़ रही है जो खाद्यान्न नहीं खरीद पाते।

होश में आने का वक्तः

हाल ही में वित्तमंत्री ने चालू वित्त वर्ष में विकास दर 7-7.5 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। पहले योजना आयोग इसे 8 फीसदी रहने का अनुमान लगा रहा था।

अर्थात् जीडीपी की प्रगति दर में 2009 के बाद से देखा जाए तो गिरावट ही है। विदेशी निवेश (एफडीआई) पूंजीगत माल में ज्यादा आना चाहिए था लेकिन नहीं आया। यूरो संकट के बाद से यूरोप की बैंक परियोजनाओं को लोन देने से बच रही हैं। भारत के तमाम परंपरागत उद्योग संकट में हैं। देश की अर्थव्यवस्था बैलगाड़ी को दुरुस्त किए बिना ही छलांग मारती हुई लक्जरी कारों में पहुंच गई है।

राज्यों के मुख्यसचिवों से खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि देश के हालात चिंताजनक हैं।

गुणवत्ता के मोर्चे पर स्थिति खराब है। चीन में 48 फीसदी लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और भारत में 7 फीसदी। इन सात फीसदी लोगों से पूछिए तो बताएंगे कि ब्राडबैंड किसी भी कंपनी का हो, अक्सर ठप मिलता है। स्कूलों में पांचवीं के बच्चों को लिखना-पढ़ना नहीं आता है। हमारे इंजीनियरों के बारे में साफ्टवेयर कंपनियां कह रही हैं कि गुणवत्ता तेजी से घट रही है।

आप ही बताइए 9-10 फीसदी की विकास दर मुल्क के किस कोने में हो रही है। अच्छी खबर यह है कि नौजवान भारत हालात को बदलना चाहता है।