मंगलवार, 29 जून 2010

अक्ल बनाम गुस्से का गणतंत्र

अब आप उस अक्लमंदी को क्या कहेंगे जिसे 25,000 लोगों की मौत पर भी किसी के भावुक होने से एतराज हो? आप एंडरसन को नहीं छोड़ते तो क्या अमेरिका परमाणु बम डाल देता? और जहरीली गैस लीक होने के अपराध में एंडरसन व केशुब महिंद्रा को नहीं पकड़ा जाएगा तो क्या यूनियन कार्बाइड के फोरमैन को पकड़ा जाएगा?

कहा जाता है कि अक्लमंद लोग हमेशा सही पाले में होते हैं। जब देश में ज्यादातर लोग भोपाल गैस त्रासदी की केस त्रासदी पर अपने सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ गुस्से से भरे हुए थे, कमजोर लोगों की मुट्ठियां तनी हुई थीं, तब कुछ अक्लमंद लोग भारत सरकार के 1984 में एंडरसन को सुरक्षित भेजने के फैसले को भारतीय इतिहास का सबसे अच्छा फैसला ठहराने में लगे हुए थे। जो एंडरसन को छोड़ने की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें भावुक विलाप करने वाला बताया जा रहा है।

देश बच गया?

कुछ मित्रों ने तो ऐसा माहौल बना दिया है कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने वारेन एंडरसन को भारत से सुरक्षित बाहर निकालकर एक तरह से देश पर अहसान ही किया है। अगर राजीव सरकार ऐसा नहीं करती तो अमेरिका पहले ही हिरोशिमा बन चुके भोपाल पर परमाणु बम और डाल देता। यानी आप अगर एंडरसन को पकड़कर भोपाल की किसी कोठरी में बंद कर देते तो रोनाल्ड रीगन हिंद महासागर में बेड़ा उतार देते। आखिर रीगन बहुत अहंकारी आदमी जो थे।

अमेरिकी पैराट्रूपर भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में उतरकर एंडरसन को छुड़ा ले जाते तो हमारी क्या इज्जत रह जाती। इसलिए यह बड़ी अक्लमंदी का फैसला था कि हमने खुद ही एंडरसन को सुरक्षित अमेरिका पहुंचा दिया। हम अपने नेताओं के शुक्रगुजार हैं कि एक फैसले से पूरा देश बच गया।

तरक्की का गणित

अक्लमंद लोग हम गुस्से वालों को समझा रहे हैं कि अमेरिकी निवेश पर कितना बुरा असर पड़ता।

हकीकत कुछ और है। वास्तव में भारत में अमेरिकी निवेश बड़ी मात्रा में 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद ही आया है।

यह बात सही है कि 1982 से 1988 के दौरान भारत का अमेरिका को निर्यात 110 फीसदी बढ़ा। फिर भी अमेरिका के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी 1988 (यानी गैस कांड के चार साल बाद) में केवल 0.7 फीसदी थी। भारत से सबसे ज्यादा आयात करने वाला देश तब भी सोवियत संघ ही था। अमेरिका भारत में अपने पूंजीगत माल, टेक्नोलाजी और अन्य वस्तुओं का निर्यात करने के लिए दबाव बनाए हुए था। वास्तव में अमेरिका को भारत में बढ़ते बाजार की असीम संभावनाएं दिखाई दे रही थीं।

आर्थिक संभावनाओं का तर्क देने वालों को यह जानकर बड़ा झटका लगेगा कि 1984 में एंडरसन को सुरक्षित पहुंचाने के बाद भी 1984 से 1987 के दौरान अमेरिका से भारत को निर्यात में 8 फीसदी की गिरावट आई। 1988 में जाकर अमेरिका से भारत को निर्यात 70 फीसदी बढ़ा वह भी ट्रांसपोर्ट उपकरणों और अनाज के क्षेत्र में।

यह बात सही है कि अमेरिकी निवेश भारत में 1985 के बाद ही बढ़ना शुरू हुआ लेकिन हमने विदेशी पूंजी के प्रस्तावों को मंजूरी देना भी तभी शुरू किया। 1985 के पहले भारत की सरकारें सालभर में केवल 51 निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दे रही थीं, लेकिन राजीव गांधी के शासनकाल में सरकार 194 निवेश प्रस्तावों को हर साल मंजूरी दे रही थी। अमेरिका अपनी विकास दर बनाए रखने के लिए निवेश करने को छटपटा रहा था। 1985 से 1988 के बीच अमेरिकी निवेश का सालाना औसत 3.59 करोड़ डॉलर था। लेकिन गैस त्रासदी के चार साल बाद यह दोगुना हो गया।

दांव पर क्या था

यानी आप कहें कि 1984-85 में अमेरिका के साथ भारत के कोई बड़े आर्थिक हित दांव पर लगे थे तो यह कुछ ज्यादा ही आशावादी होना है।

अमेरिकी सहायता भी कोई दांव पर नहीं लगी थी। 1966 में भारत को 90.2 करोड़ डॉलर की विकास सहायता अमेरिका दे रहा था, लेकिन 1988 में यह सहायता घटकर केवल 13.3 करोड़ डॉलर रह गई थी। और विकास सहायता तो इसमें नाम मात्र की 2.2 करोड़ डॉलर थी। आजकल इतने में तो एक युद्धक विमान भी नहीं आता।

अक्टूबर 1989 में (एंडरसन को सुरक्षित छोड़ने के पांच साल बाद) अमेरिका के विदेश विभाग ने भारत के साथ हुए सभी वैज्ञानिक सहयोग करारों का पुनरीक्षण कराने का आदेश जारी कर दिया था। मई 1989 में भी अमेरिका ओमनीबस ट्रेड एक्ट 1988 के तहत भारत पर प्रतिबंध की धमकियां दे चुका था। वह भारत को उस समय भी एफडीआई और बीमा उद्योग के दरवाजे खोलने के लिए धमका रहा था।

अमेरिका उस समय भी भारत के सामाजिक कार्यक्रमों को बड़ी मात्रा में धन मुहैया कराने वाले जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का एकाधिकार खत्म करना चाहता था।

तनी मुट्ठियों की ताकत

जब भारत के ज्यादातर अक्लमंद लोग अमेरिका में पढ़ाई करने या नौकरी करने चले गए थे, तब तनी हुई मुट्ठियों वाले लोगों ने ही भारत का भाग्य बदला। वह देसी प्रतिभा सस्ती थी, लेकिन विलक्षण थी। उसने अपनी हर उपलब्धि अपनी हैसियत दिखा देने के लिए हासिल की। उसने राकेट बनाए, मिसाइलें और परमाणु विस्फोट किए, अंतरिक्ष कार्यक्रमों आज भले ही ओबामा सहयोग की बात कर रहे हैं लेकिन आरंभ में उसका सहयोग सीमित था।

एपीजे अब्दुल कलाम की जीवनी पढ़कर पता लग जाएगा कि मिसाइल बनाने के लिए वह खुद किस हद तक जुनूनी थे। साधारण वेतन पाने वाले वैज्ञानिकों ने अपना सुपर कंप्यूटर बना डाला, जब अमेरिका ने उसे तकनीक देने से इनकार कर दिया। जब ओबामा अमेरिका से भारत को मिलने वाले आउटसोर्सिंग कारोबार को समेटने की कोशिशें कर रहे हैं, तब भारतीय टेकीज उद्यमियों में बदल रहे हैं।

भारत में गुस्से का गणतंत्र सत्ताधारियों को जमीन पर ला देता है। सर्वे एजेंसियों के सर्वे धरे रह जाते हैं। अब आप हमारे 25,000 लोग मार दें और हम गुस्सा भी न करें।

अन्याय के पक्ष में खड़ी अक्लमंदी के मुकाबले न्याय का पक्ष लेने वाली भावुकता अच्छी है।

गुरुवार, 17 जून 2010

मीडिया कर्मः 7 जून और उसके बाद

सात जून को गैस त्रासदी पर फैसला आने के बाद क्या भारतीय मीडिया में कुछ बदल गया है? क्या उसके केंद्र में अब वो गरीब लोग भी आ गए हैं, जो मोबाइल, कारें, एलसीडी या लैपटाप नहीं खरीद सकते?

जयप्रकाश पाराशर

कुछ लोग मानते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी पर बवाल भोपाल के तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह के बयान से शुरू हुआ। कुछ लोगों का ख्याल है कि यह मसला चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) मोहन पी तिवारी की अदालत का फैसला आने के बाद मीडिया ने शुरू किया। मीडिया ने उन तमाम लोगों को खंगाल डाला जो कहीं न कहीं इस त्रासदी से जुड़े हुए थे। लिहाजा लोगों को पता लगा कि 26 साल पहले वास्तव में क्या साजिशें हुई थीं।

यह मानने वालों की भी कमी नहीं है कि गैस त्रासदी अगर 2010 के मीडिया युग में हुई होती तो न वारेन एंडरसन भाग पाता और न फैसले में इतना विलंब होता। इसमें कोई शक नहीं कि गैस पीड़ितों के साथ हुए छल की परतें उधेड़ने में भारतीय मीडिया ने अद्भुत काम किया है। जब देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका गूंगे-बहरों में बदल गए थे, तब मीडिया ने उस लड़ाई का जिम्मा अपने ऊपर लिया।

अलबत्ता, इस पूरी घटना में कोई 1857 हुआ तो वह उसी समय हो गया था जब लोग निषेधाज्ञा (धारा 144) का उल्लंघन करके भी अदालत के सामने डट गए थे। जब उन्होंने देखा कि वे 26 साल से जिस फैसले का इंतजार कर रहे थे, जिस मामले में 25,000 लोग जानें गंवा बैठे हैं, लाखों लोग बीमारियां पाले घूम रहे हैं, उसमें दोषियों को केवल दो-दो साल की सजा सुनाई गई है और वारेन एंडरसन सजा से एकदम बाहर है, तो वहां एक बगावत हो चुकी थी। यही वह समय था जब मीडिया उनके साथ हो गया।

यह फैसला पहली नजर में ही इतना अन्यायकारी और अमानवीय दिखाई पड़ता है कि देश के गरीब हों या अमीर, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, या विशाल मध्यमवर्ग हर किसी को हिला गया। एक संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पर चोट हुई थी। लोगों को पहली बार अहसास हुआ कि उनका सिस्टम कितना बीमार, असंवेदनशील और कमजोर है।

मीडिया का निर्भय-नादः

यह देखना सुखद था कि भूत-प्रेत और टोने-टोटकों की गिरफ्त में फंसे चैनल हों या सोशियो इकानामिक कैटेगरी-ए 1 व ए 2(उच्च आय वर्ग) के पूजा-पाठ में लगे अखबार, वे देर लगाए बिना गरीबों की लड़ाई में कूद पड़े।

टाइम्स नाऊ ने जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एएम अहमदी से पूछा कि उन्होंने एनडी जयप्रकाश की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी, तो उनके पास इसके सिवा कोई जवाब नहीं था कि उन्हें कुछ याद नहीं।

हर टीवी चैनल, वह सहारा समय हो या आईबीएन7, सबने तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह, पायलट हसन अली, मोहन तिवारी से लेकर मौजूदा नेताओं तक को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अखबारों की आक्रामकता भी हैरान करने वाली थी। जहां लोग नगर निगम कमिश्नर के खिलाफ लिखने से बचते हों, वहां राजीव गांधी से लेकर मौजूदा सरकार तक को कठघरे में खड़ा करना क्या आपको मीडिया के रुख में बदलाव नहीं लगता?

केंद्र में यूपीए सरकार का लिहाज किए बिना राजीव गांधी का नाम हैडलाइन में छापना कोई कम साहस का काम नहीं था। अखबारों में इस तरह के साहस कम ही किए जाते हैं। व्यक्तिगत राग-द्वेष या लाभ-हानि देखकर भले ही नेताओं के खिलाफ अभियान चलाए जाते हों लेकिन अवाम के लिए बैठे ठाले कोई पंगा नहीं लेता।

आजकल एसईसी से नीचे का आदमी ब्लागरों के भरोसे छोड़ दिया गया है।

अखबारों में भी बड़ी खबरें भले ही ब्रेक नहीं हुई हों लेकिन उन्होंने हर मसले को छुआ है, वो गैस राहत अस्पताल हों, इलाज हो या नेताओं की बयानबाजियां हों, झूठ हों या दोहरे चरित्र।

जंग अभी बाकी है दोस्तः

मीडिया के लिए अभी जंग खत्म नहीं हुई है। कांग्रेस में आंतरिक सेंसर घोषित हो चुका है, वहां जिद्दी और लड़ाकू लोग भी मौनी बाबाओं में बदल चुके हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार नए पैकेज की तैयारी कर रही है। वह विनिवेश और स्पेक्ट्रम बेचकर जो पैसा कमाने वाली है, उसका एक हिस्सा भोपाल पहुंचने वाला है। इसलिए मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ गई है।

अभी तो उस व्यवस्था की खाल उधेड़नी बाकी है, जिसमें हजारों छिद्रों से बहकर करोड़ों की राहतें सरकारी बाबुओं, अफसरों, फर्जी एनजीओ, छुटभैये नेताओं और बाहुबलियों के खातों और घरों में पहुंच जाती है।

उन अस्पतालों का इलाज करना बाकी है, जहां इलाज के नाम पर कर्मकांड चल रहा है। जहां सरकार की ओर से दी जाने वाली दवाएं सामने वाले मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती है। जिनके अहाते में ऐसे एजेंट टहल रहे हैं जो किसी पीड़ित के नाम पर किसी और का इलाज करा रहे हैं।

उन लोगों को तलाशना बाकी है, जिन्होंने गैस कांड में सब कुछ खो दिया लेकिन उनके नाम कहीं नहीं हैं। न सरकार के रजिस्टर में और न नेताओं की समृति में।

हमने भी उनके लिए कुछ नहीं किया तो बेचारों को गैस त्रासदी के स्मारक से काम चलाना पड़ेगा।