फिल्मों में उनसे बेहतर गीत लिखने वाले हो सकते हैं, मंचों पर उनसे बेहतर कविता पढ़ने वाले हो सकते हैं, लेकिन उनसे ज्यादा सच्चा, सरल-सहज नेता शायद नहीं होगा, जो कुर्सी का उपासक नहीं था, वह बेबाक सत्य का संधान करता था।
जयप्रकाश पाराशर
जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया तो विट्ठलभाई पटेल ने उन्हें ईमानदारी के लिए बधाई दे डाली। कहा, यह काम कोई ईमानदार व्यक्ति ही कर सकता था। वह खुद म.प्र. में कांग्रेस की सरकार में मंत्री थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा, जो आज कांग्रेस के कोषाध्यक्ष हैं, उन्होंने किसी तरह लीपा-पोती करके विट्ठलभाई का मंत्रीपद बचाया। वोराजी ने कहा कि विट्ठलभाई ने यह बधाई एक कवि के रूप में दी है।
उनके भीतर का कवि-साहित्यकार अक्सर राजनीति पर अतिक्रमण करता रहा। लिहाजा राजनीति के घाघ खिलाड़ी उन्हें राजनीति से अक्सर बेदखल करते रहे।
सागर की फूलछाप बीड़ी बनाने वाले गुजराती पटेल के घर पैदा हुआ यह इंसान कई मायनों में असाधारण था। सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मों के गीत लिखने वाले विट्ठलभाई पटेल मध्य प्रदेश में मंत्री रहे और वह ऐसे राजनीतिक शख्स थे, जो कभी झूठ नहीं बोलते थे। कार्यक्रमों में निर्धारित समय पर पहुंचते थे।
किशोर कुमार से उन्हें इतना लगाव था कि खंडवा में किशोर कुमार का स्मारक बनाने के लिए एक-एक रुपए की भीख मांग सकते थे। जनता के सरोकार से इस हद तक जुड़े थे कि नगर निगम की उपेक्षा के खिलाफ खुद झाड़ू लेकर सफाई पर निकल सकते थे। वह गांधी तो नहीं थे लेकिन ऐसे गांधीवादी थे, जिनके पीछे लोग निकल पड़ते थे।
सामाजिक सरोकार
विट्ठलभाई पटेल का शनिवार को सागर में 79 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हो गया। करीब दो साल से उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था और वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई नहीं दे रहे थे। अन्यथा वे सामाजिक सरोकार के हर कार्यक्रम में लाठी टेकते हुए हाजिर हो जाते। अपनी राय व्यक्त करके ही लौटते थे।
फिल्मों का गीतफरोश
फिल्मों में मुश्किल से 40 से ज्यादा गीत लिखे होंगे। लेकिन जब राजकपूर ने अपने बेटे ऋषिकपूर और डिंपल कपाड़िया को लेकर 'बॉबी' फिल्म बनाई तो हर घर के रेडियो पर एक गीत बज रहा थाः 'झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो, मैं मइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो।'
स्थानीय कहावत से रचे गए मुखड़े और उस हिट गीत की व्याख्या विट्ठलभाई करते तो झूठ बोलने वाला नेता होता और नाराज होने वाली जनता होती।
विट्ठलभाई ने 'संन्यासी' और 'सत्यम शिवम सुंदरम' जैसी फिल्मों के कई लोकप्रिय गीत लिखे। वह खुद एक ऐसे संन्यासी थे, जो सत्य, शिव और सुंदरता की खोज में लगे रहते थे।
राजनीति में बेदखल नेता
सागर के महेश तिवारी उनके करीबी सहयोगी थे। कांग्रेस की राजनीति में भी साथ काम किया। वह बता सकते हैं कि विट्ठलभाई ने राजनीतिक फायदा नुकसान कभी नहीं देखा। वह सुरखी से विधानसभा के लिए दो बार चुने गए। सत्य की पक्षधरता के कारण बहुत सारी नाराजगियां झेलीं।
वह राजनीति में थे, लेकिन झूठ बोलने में जरा भी यकीन नहीं था। वह सत्य के हिमायती थे और उनका सत्य बेबाक व ठेठ होता था। वह बहुत सरल सहज इंसान थे। वह ऐसे नेता थे, जिनका हर कोई आदर करता था।
किशोर कुमार के प्रति
विट्ठलभाई का अद्भुत किस्सा खंडवा के जय नागड़ा ने सुनाया। विट्ठलभाई को यह बात सालती थी कि खंडवा में किशोर कुमार का कोई स्मारक नहीं बनाया जा रहा है। सरकार कुछ कर नहीं रही थी। विट्ठलभाई ने अभियान छेड़ दिया, एक-एक रुपए इकट्ठे करने का। खंडवा से लेकर सागर तक एक-एक रुपया मांगने लगे। नतीजा यह हुआ कि सरकार को किशोर कुमार का स्मारक बनाना पड़ा। विडंबना देखिए कि मांग-मांगकर उन्होंने जो एक-डेढ़ लाख रुपए इकट्ठे किए, जिस सहकारी बैंक में रखे वह बैंक ही डूब गया।
जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया तो विट्ठलभाई पटेल ने उन्हें ईमानदारी के लिए बधाई दे डाली। कहा, यह काम कोई ईमानदार व्यक्ति ही कर सकता था। वह खुद म.प्र. में कांग्रेस की सरकार में मंत्री थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा, जो आज कांग्रेस के कोषाध्यक्ष हैं, उन्होंने किसी तरह लीपा-पोती करके विट्ठलभाई का मंत्रीपद बचाया। वोराजी ने कहा कि विट्ठलभाई ने यह बधाई एक कवि के रूप में दी है।
उनके भीतर का कवि-साहित्यकार अक्सर राजनीति पर अतिक्रमण करता रहा। लिहाजा राजनीति के घाघ खिलाड़ी उन्हें राजनीति से अक्सर बेदखल करते रहे।
किशोर कुमार से उन्हें इतना लगाव था कि खंडवा में किशोर कुमार का स्मारक बनाने के लिए एक-एक रुपए की भीख मांग सकते थे। जनता के सरोकार से इस हद तक जुड़े थे कि नगर निगम की उपेक्षा के खिलाफ खुद झाड़ू लेकर सफाई पर निकल सकते थे। वह गांधी तो नहीं थे लेकिन ऐसे गांधीवादी थे, जिनके पीछे लोग निकल पड़ते थे।
सामाजिक सरोकार
विट्ठलभाई पटेल का शनिवार को सागर में 79 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हो गया। करीब दो साल से उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था और वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई नहीं दे रहे थे। अन्यथा वे सामाजिक सरोकार के हर कार्यक्रम में लाठी टेकते हुए हाजिर हो जाते। अपनी राय व्यक्त करके ही लौटते थे।
फिल्मों का गीतफरोश
फिल्मों में मुश्किल से 40 से ज्यादा गीत लिखे होंगे। लेकिन जब राजकपूर ने अपने बेटे ऋषिकपूर और डिंपल कपाड़िया को लेकर 'बॉबी' फिल्म बनाई तो हर घर के रेडियो पर एक गीत बज रहा थाः 'झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो, मैं मइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो।'
स्थानीय कहावत से रचे गए मुखड़े और उस हिट गीत की व्याख्या विट्ठलभाई करते तो झूठ बोलने वाला नेता होता और नाराज होने वाली जनता होती।
विट्ठलभाई ने 'संन्यासी' और 'सत्यम शिवम सुंदरम' जैसी फिल्मों के कई लोकप्रिय गीत लिखे। वह खुद एक ऐसे संन्यासी थे, जो सत्य, शिव और सुंदरता की खोज में लगे रहते थे।
राजनीति में बेदखल नेता
सागर के महेश तिवारी उनके करीबी सहयोगी थे। कांग्रेस की राजनीति में भी साथ काम किया। वह बता सकते हैं कि विट्ठलभाई ने राजनीतिक फायदा नुकसान कभी नहीं देखा। वह सुरखी से विधानसभा के लिए दो बार चुने गए। सत्य की पक्षधरता के कारण बहुत सारी नाराजगियां झेलीं।
वह राजनीति में थे, लेकिन झूठ बोलने में जरा भी यकीन नहीं था। वह सत्य के हिमायती थे और उनका सत्य बेबाक व ठेठ होता था। वह बहुत सरल सहज इंसान थे। वह ऐसे नेता थे, जिनका हर कोई आदर करता था।
किशोर कुमार के प्रति
विट्ठलभाई का अद्भुत किस्सा खंडवा के जय नागड़ा ने सुनाया। विट्ठलभाई को यह बात सालती थी कि खंडवा में किशोर कुमार का कोई स्मारक नहीं बनाया जा रहा है। सरकार कुछ कर नहीं रही थी। विट्ठलभाई ने अभियान छेड़ दिया, एक-एक रुपए इकट्ठे करने का। खंडवा से लेकर सागर तक एक-एक रुपया मांगने लगे। नतीजा यह हुआ कि सरकार को किशोर कुमार का स्मारक बनाना पड़ा। विडंबना देखिए कि मांग-मांगकर उन्होंने जो एक-डेढ़ लाख रुपए इकट्ठे किए, जिस सहकारी बैंक में रखे वह बैंक ही डूब गया।