बिहार में मिड डे मील के दौरान हुई स्कूली बच्चों की मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं और मीडिया के एक हिस्से ने इस योजना को मौत के सामान की तरह पेश किया है। कई खबरों में तो यह तक कहा गया कि बच्चे भूख से नहीं मरे लेकिन भोजन से मर गए। इस तरह एक अच्छी योजना, जिसका योगदान बच्चों को स्कूलों की ओर लौटाने में रहा है, गलत नजरिए का शिकार हो रही है।
जयप्रकाश पाराशर
बच्चों की मौतों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि योजना की मानिटरिंग उतनी सतर्कता से नहीं की जा रही है, जितनी सतर्कता से की जानी चाहिए। लेकिन क्या यह इतनी खराब योजना है, जितना उसके बारे में प्रचार किया जा रहा है?
अगर आप करीब से देखें तो मिड डे मील योजना वास्तव में एक अच्छी योजना साबित हुई है। इसे जारी रखने के पक्ष में कुछ तर्क इस प्रकार हैं-
लक्ष्य तक भोजनः यह योजना उन सरकारी स्कूलों में संचालित है, जहां अब गरीबों, मजदूरों और वंचित वर्ग के बच्चे ही पढ़ने आते हैं। एक शिक्षक ने बताया कि किसी सरकारी विभाग का चपरासी भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाता। इन स्कूलों में निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले या भूमिहीन कृषि मजदूरों के बच्चे ही पढ़ने आते हैं अथवा उन गांवों के बच्चे जहां दूसरा कोई विकल्प नहीं है। मजदूर रोजगार की उपलब्धता के हिसाब से अपने रहवास के स्थल बदलते रहते हैं। खानाबदोशी उनकी जीवनशैली का हिस्सा बन जाती है। श्रमिक आमतौर पर सुबह जल्दी ही काम पर चले जाते हैं। उनके लिए संभव नहीं रहता कि वे बच्चों को दोपहर का भोजन अपनी उपस्थिति में कराएं। मिड डे मील योजना ने इस वर्ग तक भोजन पहुंचाने का अहम काम किया है।
स्कूलों में नामांकन बढ़ेः एक समय था जब कहा जा रहा था कि बच्चों की संख्या ज्यादा दिखाने के लिए नामांकन बढ़ा-चढ़ाकर किए जा रहे हैं। वास्तव में अब ऐसा नहीं है। स्कूलों में जितने भी नामांकन हैं, उन्हें परीक्षा में उपस्थित दिखाना जरूरी है। यदि बच्चा परीक्षा में उपस्थित नहीं होता है तो शिक्षकों को उनके लिए अलग से परीक्षा कराना अनिवार्य है। यदि बच्चे स्कूल छोड़कर जा रहे हैं तो उन स्कूलों का रिकार्ड प्रस्तुत करना अनिवार्य है, जहां ये बच्चे एडमिशन ले रहे हैं या उन्होंने जहां एडमिशन लिया है। ड्रापआउट के मामले में शिक्षकों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वे कारणों का खुलासा करें और बच्चों के पालकों तक जाकर काउंसलिंग करें ताकि बच्चों को फिर स्कूलों में लौटने के लिए तैयार किया जा सके। इसलिए अगर स्कूलों में नामांकन बढ़ रहे हैं, तो वे वास्तविकता के काफी करीब हैं और उसमें मिडडे मील योजना का बड़ा योगदान हैं। गरीब, अनियमित आय वाले और मजदूरी करने वाले मां बाप बच्चों को दोपहर के भोजन और उसके साथ ही पढ़ने के उद्देश्य से स्कूल भेजने को प्रेरित होते हैं।
शिक्षा की ओर रुखः सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं, फिर भी जिन बच्चों के शिक्षा के बगैर रहने का खतरा था, वे कम से कम स्कूल की ओर लौट रहे हैं। कम आय वर्ग और श्रमिकों के बच्चे पहले किसी ऐसे काम में लगा दिए जाते थे, जहां से परिवार को अतिरिक्त आय हो सके। बाल श्रमिक निरोधक कानून के होने के बाद भी कम मेहनत वाले कई कामकाज ऐसे हैं, जहां बच्चों से काम कराया जाता है ताकि लागत कम की जा सके। मिड डे मील योजना ने बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित किया और बालश्रम की समस्या का समाधान भले ही न किया हो, समस्या को कम करने में मदद जरूर की है।
कुपोषण व बीमारी का इलाजः बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। उन्हें लक्ष्य बनाकर अगर पोषक आहार दिया जाए तो इस समस्या से निपटा जा सकता है। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मध्यान्ह भोजन योजना में पोषक तत्वों के निर्धारित मापदंडों का काफी हद तक पालन किया गया है। जहां मानिटरिंग का अभाव है या संचालन करने वाले लोग ठीक नहीं है, वहां गुणवत्ता जरूर खराब रही है और गुणवत्ता की जांच मौके पर नियमित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी योजना का संचालन या तो एनजीओ कर रहे हैं या पालकों-शिक्षकों की समिति करती है। भोजन में सोयाबीन, हरी सब्जियां, चावल और दालों से बनने वाला मिडडे मील बच्चों में कुपोषण की समस्या से निपटने में मदद कर सकता है। यदि कुपोषण पर नियंत्रण कर लिया जाए तो इसका फायदा कई बीमारियों से बचाव करने में मिलेगा।
कुपोषण व बीमारी का इलाजः बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। उन्हें लक्ष्य बनाकर अगर पोषक आहार दिया जाए तो इस समस्या से निपटा जा सकता है। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मध्यान्ह भोजन योजना में पोषक तत्वों के निर्धारित मापदंडों का काफी हद तक पालन किया गया है। जहां मानिटरिंग का अभाव है या संचालन करने वाले लोग ठीक नहीं है, वहां गुणवत्ता जरूर खराब रही है और गुणवत्ता की जांच मौके पर नियमित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी योजना का संचालन या तो एनजीओ कर रहे हैं या पालकों-शिक्षकों की समिति करती है। भोजन में सोयाबीन, हरी सब्जियां, चावल और दालों से बनने वाला मिडडे मील बच्चों में कुपोषण की समस्या से निपटने में मदद कर सकता है। यदि कुपोषण पर नियंत्रण कर लिया जाए तो इसका फायदा कई बीमारियों से बचाव करने में मिलेगा।
योजना की सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रति छात्र प्रदान की जाने वाली धनराशि काफी कम है। खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति को देखते हुए गुणवत्ता मानकों में गिरावट आना स्वाभाविक है। योजना को ज्यादा प्रभावशाली और आकर्षक बनाने के लिए इसमें भोजन की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिए और इसके साथ अन्य लाभ भी जोड़ने चाहिए ताकि निम्न आय वर्ग के लोगों को अपने बच्चों को स्कूलों में भेजने को प्रेरित किया जा सके।
यदि इस योजना में मानिटरिंग की व्यवस्था को ज्यादा मजबूत बनाया जा सके और बच्चों के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करके उनके हेल्थ मानकों के रिकार्ड रखे जाएं तो इस योजना के आश्चर्यजनक परिणाम लाए जा सकते हैं।
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