मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

भारत पर चीन का एक खामोश हमला यह भी



चीन का सामरिक हमला हर किसी की नजर में है, लेकिन एक हमला ऐसा है जो भारत के निर्माताओं को खोखला और समाप्त कर रहा है। समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके गंभीर नतीजे आएंगे।

जयप्रकाश पाराशर


कुछ माह पहले महाराष्ट्र के एक नेता अपना नवनिर्मित बंगला दिखाने लगे। आर्किटेक्चर और डिजाइन के बाद बात जब फर्नीचर की आई तो उनके उद्यमी बेटे ने तपाक से कहा कि फर्नीचर चीन से लाएंगे। यहां बनवाना महंगा पड़ेगा। मैं अवाक था। वह बंगले का डिजाइन चीन ले जाने और वहां कस्टमाइज्ड फर्नीचर का आर्डर देकर आने वाले थे। यह फर्नीचर जहाज के जरिए मुंबई पहुंचने वाला था। कंसट्रक्शन का काम करने वाले उनके बेटे ने मेरे आश्चर्य को यह कहकर और बढ़ा दिया कि वह अपने मल्टीस्टोरीड  भवनों या अपार्टमेंट्स के लिए ज्यादातर सामग्री चीन से लाते हैं।

छोटे उद्यमों पर खतरा

चीन ने भारत में छोटे-छोटे उद्योगों को बंद होने की कगार पर ला दिया है। सबसे बड़ी मार माइक्रो उद्योगों पर हो रही है। यह छोटे काम ही ज्यादा रोजगार पैदा करते रहे हैं, बल्कि शताब्दियों से भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। दीपक बनाने वाले कुम्हार, सजावटी बिजली व सीरीज, बैटरियां, चार्जर, गणपति और राखियां बनाने वाले कारीगर, आलपिन और कीलें, तगारियों, फर्नीचर, पालीबैग्स, कालीन जैसे उन तमाम उद्यमों में लगे लोगों के सामने बेरोजगारी का खतरा पैदा हो गया है। घरों में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर सजावटी वस्तुएं चीन से लाई जा रही हैं। उनकी लागत इतनी कम है कि आयात का खर्च जोड़ने के बाद भी अच्छा खासा मार्जिन आयातकों को बच जाता है। इस सस्ते माल के सामने भारत का स्थानीय निर्माता खुद को असहाय पा रहा है।

चीन की लागत कम क्यों

यह 1997 के आसपास का समय रहा होगा जब मैंने देखा कि भारत की मशरूम उगाने वाली बड़ी कंपनियां तेजी से बंद हो रही थीं या उन्होंने अपनी योजनाओं को स्थगित कर दिया था। पड़ताल करने पर पता लगा कि चीन ने दुनिया भर के बाजारों को अपने मशरूम से भर दिया है। भारत का मशरूम गुणवत्ता में बेहतर होने के बाद भी बाजार से बाहर हो रहा था। जब मैंने चीन के मशरूम उत्पादकों के काम करने के मॉडल को देखा तो वह मुझे कुछ-कुछ मध्य प्रदेश के बीड़ी निर्माताओं जैसा लगा। वहां सरकारी एजेंसियां लोगों को मशरूम उत्पादन के लिए भूसा और अन्य कच्चा माल उपलब्ध कराती थीं, जिसे लोग घर ले जाते थे और मशरूम पैदा करके उसी एजेंसी को लौटा देते थे। इसी मशरूम को पैक करके निर्यात करने का काम दूसरी बड़ी सरकारी एजेंसी कर रही थी। पूरी प्रक्रिया में लागत इतनी कम आ रही थी कि भारत के मशरूम निर्यातक तेजी से बाजार से बाहर हो गए।

हाल ही में चीन की सस्ती आलपिन से संघर्ष कर रहे इंदौर के एक आलपिन निर्माता से मुलाकात हुई। चीन की लागत कम होने के उसने बड़े आश्चर्यजनक कारण बताए। उसका कारण है कि चीन में लागत कम होने का सिलसिला लौह अयस्क से ही शुरू हो जाता है। बिजली की कम लागत और सस्ता लौह अयस्क वायर निर्माता को काफी मार्जिन तैयार कर देते हैं। सरकारी एजेंसी ही यह वायर किसी आलपिन निर्माता को देती है और मजदूरी के एवज में आलपिन वापस एजेंसी के पास आ जाती है। बहुत मामूली टैक्स दरों के बाद भारतीय आयातक के पास इतना मार्जिन होता है कि भारतीय निर्माता बाजार से बाहर होने लगता है।

भारत में स्थितियां एकदम उलटी हैं। भ्रष्टाचार की लागत इतनी ज्यादा और व्यापक है कि वह लौह अयस्क की खदान के आवंटन से शुरू होती है और बिक्री कर विभाग तक आते-आते निर्माता के पास मामूली मार्जिन रह जाता है। ईंधन और परिवहन की लागत ने भारतीय निर्माता को खात्मे के करीब पहुंचा दिया है।

कारीगरों का समापन

हमारी सरकारें और बुद्धिजीवी जो गरीबों और छोटे कामगारों-उद्यमियों की बात करते हुए नहीं थकते इस पर कभी गौर नहीं करते। वामपंथी बुद्धिजीवी जो कुटीर और लघु उद्योगों की वकालत करते हैं चीन के हाथों हमारे कामधंधों को खत्म होते देख रहे हैं। प्रभावित होने वाले लोगों में वही कुम्हार, जुलाहे, मुसलमान कारीगर और छोटे उद्यमी है।

भारतीय नीति निर्माताओं को चीन के राजनयिक और सामरिक दबाव के सामने झुकने के बजाय देश को भीतर से खोखला होने से बचाना होगा। ज्यादा समय नहीं लगेगा जब भारत के कारीगर, छोटे निर्माता, कुटीर उद्योग, माइक्रो उद्योग समाप्त हो जाएंगे। आज भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर ठप पड़ने का प्रमुख कारण यह है कि यहां निर्माताओं (मैन्युफैक्चरर) को महत्व नहीं दिया जा रहा है। भ्रष्टाचार, महंगे बिजली व डीजल, महंगा श्रम और टैक्स मिलकर उसे खत्म कर रहे हैं। 

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