शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

हांफती तरक्की के भद्दे कलर विज्ञापन

नौ फीसदी विकास दर वाले देश के 42 फीसदी बच्चे कुपोषित और 7 फीसदी लोग मजे में

जयप्रकाश पाराशर


कुछ दिनों पहले हंगर एंड मालन्यूट्रीशन इन इंडिया (हंगामा) की रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘राष्ट्रीय शर्म’ का अनावरण किया था। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान औसत 8.2 फीसदी की विकास दर हासिल करने और बारहवीं योजना (2012-17) में 9 फीसदी का लक्ष्य रखने वाले देश के सौ जिलों में 42 फीसदी बच्चे अंडरवेट पाए गए। 66.3 फीसदी मांओं ने कहा कि वे कभी स्कूल नहीं गईं। सौ फीसदी मांओं ने कहा कि उनके घर में साबुन है, लेकिन केवल 19 फीसदी मांओं ने कहा कि उनके बच्चे टायलट जाने के बाद हाथ धोते हैं।
देश के सबसे खराब माने गए इन सौ जिलों में से 40 उत्तर प्रदेश में हैं जहां मायावती से कांग्रेस का विधानसभा संग्राम चल रहा है, 22 बिहार के हैं, जहां नीतीशकुमार लगातार दूसरी बार सत्ता में चुने गए, 12 मध्य प्रदेश में है, जहां शिवराज सिंह लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रहे, 5 जिले उड़ीसा में हैं, जहां नवीन पटनायक लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रहे, 15 जिले झारखंड में हैं, जहां कोई भी सरकार कभी पांच साल पूरे नहीं कर पाई और इनमें से एकमात्र कांग्रेसशासित राजस्थान के 10 जिले हैं। फिर भी यह राष्ट्रीय विषय है, भले ही शर्म का है।

विकास के विरोधाभासः

देश की कुल आबादी में 70 फीसदी महिलाएं और बच्चे हैं। इनमें 66.3 फीसदी माताओं ने कभी स्कूल नहीं देखा और 42 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

फिर भी योजना आयोग पता नहीं क्यों अगले पांच साल में 9 फीसदी विकास दर का लक्ष्य लेकर चल रहा है। नौ फीसदी विकास दर का अर्थ है कि आपका जीडीपी केवल नौ साल में दोगुना हो जाएगा। हम यह कैसी तरक्की कर रहे हैं? आर्थिक विकास दर का अंतिम लक्ष्य है समाज के सदस्यों के जीवन स्तर में सुधार लाना।

आंकड़े बता रहे हैं कि केवल 7 फीसदी लोग अच्छे जीवन का आनंद उठा रहे हैं।

गरीबी बढ़ा रहे ऊंचे वेतनः

हर साल कंपनियों के बड़े अधिकारियों और आईआईएम से निकलने वालों के वेतन बढ़ने की खबरें आ रही हैं। इनके वेतन हर साल 12-15 फीसदी तक बढ़ रहे हैं। इसका अर्थ है कि मुद्रास्फीति का बढ़ना। उनकी डिस्पोजेबल इनकम केवल खाद्य पदार्थों की कीमतें ही नहीं बढ़ा रही बल्कि मुद्रास्फीति के कारण हर साल गरीबों की संख्या बढ़ती जाती है। अनाज की कीमतें बढ़ने के कारण ऐसे गरीबों की तादाद बढ़ रही है जो खाद्यान्न नहीं खरीद पाते।

होश में आने का वक्तः

हाल ही में वित्तमंत्री ने चालू वित्त वर्ष में विकास दर 7-7.5 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। पहले योजना आयोग इसे 8 फीसदी रहने का अनुमान लगा रहा था।

अर्थात् जीडीपी की प्रगति दर में 2009 के बाद से देखा जाए तो गिरावट ही है। विदेशी निवेश (एफडीआई) पूंजीगत माल में ज्यादा आना चाहिए था लेकिन नहीं आया। यूरो संकट के बाद से यूरोप की बैंक परियोजनाओं को लोन देने से बच रही हैं। भारत के तमाम परंपरागत उद्योग संकट में हैं। देश की अर्थव्यवस्था बैलगाड़ी को दुरुस्त किए बिना ही छलांग मारती हुई लक्जरी कारों में पहुंच गई है।

राज्यों के मुख्यसचिवों से खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि देश के हालात चिंताजनक हैं।

गुणवत्ता के मोर्चे पर स्थिति खराब है। चीन में 48 फीसदी लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और भारत में 7 फीसदी। इन सात फीसदी लोगों से पूछिए तो बताएंगे कि ब्राडबैंड किसी भी कंपनी का हो, अक्सर ठप मिलता है। स्कूलों में पांचवीं के बच्चों को लिखना-पढ़ना नहीं आता है। हमारे इंजीनियरों के बारे में साफ्टवेयर कंपनियां कह रही हैं कि गुणवत्ता तेजी से घट रही है।

आप ही बताइए 9-10 फीसदी की विकास दर मुल्क के किस कोने में हो रही है। अच्छी खबर यह है कि नौजवान भारत हालात को बदलना चाहता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें