शुक्रवार, 28 मई 2010

पोखरियाल के अतिथि तुम कब जाओगे

उत्तराखंड को अलग राज्य इसलिए बनाया गया था कि उसका विकास हो। विकास हुआ, लेकिन उस विकास की क्या कीमत राज्य चुका रहा है? पर्यटन यहां प्रमुख उद्योग है, लेकिन क्या पर्यटक यहां दोबारा आना चाहेंगे?

जयप्रकाश पाराशर

अगर आप यमुनोत्री-गंगोत्री-केदारनाथ की यात्रा पर जाने का मन बना रहे हैं तो कम से कम उत्तराखंड की सरकार के भरोसे न जाएं। यहां सरकार यात्रियों के लिए तकरीबन नदारद है। यह भी तस्दीक कर लें कि आडवाणी जी या कोई अन्य वीआईपी तो वहां नहीं जा रहा, अन्यथा निसर्ग के रचे इस स्वर्ग में भी आपकी जिंदगी नर्क हो जाएगी।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निश्शंक’ पत्रकार भी रहे हैं। लेकिन लगता नहीं है कि आम जनता से उनका कुछ सरोकार रह गया है। ईश्वर की खोज में यहां देशभर से आने वाले यात्रियों को ईश्वर के भरोसे ही छोड़ दिया गया है। पहाड़ पर भी आपको लगेगा कि आप दिल्ली के किसी जाम में फंसे हैं।

विकास बनाम पर्यावरणः

उत्तराखंड ने पिछले बीस सालों में गजब की तरक्की की है। यहां शानदार सड़कें बनी हैं, बांध बने हैं, बिजली और पेयजल की अच्छी सुविधाओं का विकास हुआ है। गांवों में पक्के मकानों की श्रृंखलाएं खड़ी हो गई हैं। जल संरचनाओं का विकास हुआ।

नए-नए होटलों-मोटलों, रिसॉर्ट और बाजारों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता। मैदान से लोगों की पहुंच आसान हुई, जिसका फायदा पर्यटन उद्योग को मिला।

दूसरी तरफ पहाड़ गर्म हो रहे हैं, बल्कि उजाड़ और भूस्खलनों के भग्नावशेषों के साथ डरावने होते जा रहे हैं। नदी की गोद, जिस पर केवल नदी की उद्दाम धाराओं का अधिकार होता है, मकानों-होटलों और आश्रमों के निर्माण हो गए हैं। यह देखना भयानक था कि टिहरी के गलाईखेत जैसे गांवों में दो साल से बारिश नहीं हुई है, वृक्ष ठूंठों में बदल गए हैं, पहाड़ों को काटकर बनाए गए खेतों में बाजरा तक उगने से इनकार कर रहा है। गंगोत्री हो या यमुनोत्री जलधाराओं के आसपास इतने निर्माण कर दिए गए हैं कि उनकी प्राकृतिक पवित्रता नष्ट हो गई है।

आर्थिक विषमता का हाल यह है कि मैंने एक शख्स को बारह रुपए लीटर का दूध बेचने के लिए पैदल ढाई किलोमीटर जाते हुए देखा।

हर कहीं प्लास्टिक के खिलाफ बोर्ड लगे हैं। लेकिन सफाईकर्मियों को केदारनाथ में प्लास्टिक से भरी कूड़ागाड़ी को नदी में उड़ेलते आसानी से देखा जा सकता है। वहां जितनी दुकानें हैं सबकी छत पर तना प्लास्टिक पोखरियाल सरकार के संदेशों का मजाक उड़ा रहा है।

स्थानीय लोगों में भी इस बात को लेकर नाराजगी है कि हर साल देशभर का कूड़ा उत्तराखंड में छोड़ दिया जाता है। हरिद्वार में कुंभ मेले के बाद मच्छरों की इतनी भरमार हो गई है, जिसे देखकर लगता है कि मच्छर भी कुंभ का आयोजन कर रहे हैं।

आडवाणी जी आए, मुसीबत आईः

जब 16 मई को यमुनोत्री के पट खुले तो रास्तों पर भारी चक्काजाम था। जानकी चट्टी तक रास्ते भर बसें और अन्य छोटे वाहन कई किलोमीटर तक फंसे थे। पूरे रास्ते में पुलिस की कोई व्यवस्था नहीं थी।

जानकी चट्टी से करीब छह किलोमीटर के पैदल रास्ते पर इतनी ज्यादा भीड़ थी कि एक समय भगदड़ मचने का खतरा पैदा हो गया था। चार-पांच फुट संकरे रास्ते पर घोड़ों, पालकी और कंडी वालों का जाम इस तरह लगा था कि कोई छोटी सी चूक हजारों लोगों की जान ले सकती थी। इसके महज दो कारण थे-

1) भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अगले दिन गंगोत्री आ रहे थे। लिहाजा पूरे इलाके के पुलिसकर्मी (जिनकी संख्या करीब दो सौ थी) गंगोत्री के रास्ते पर तैनात कर दिए गए थे। मुख्यमंत्री पोखरियाल, पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खडूंड़ी के साथ वहां पधार रहे थे।
2) यमुनोत्री के पुजारियों ने पट दोपहर 12 बजे खोले, जबकि वहां लोग सुबह पांच बजे ही पहुंच गए थे। वहां इस बात पर किसी का नियंत्रण नहीं था कि आखिर ऊपर कितने लोगों को जाने देना चाहिए।

लोगों का धरनाः

यमुनोत्री के इस जाम से किसी तरह निकले लोग जब 17 मई को उत्तरकाशी पहुंचे तो वहां सुबह सात बजे से ही पुलिस ने ऊपर जाने से रोक दिया। छोटे-छोटे बच्चों और बूढ़ों को वहां खाने-पीने के लिए भी तरसते देखना बड़ा कष्टकारी था।

मुश्किल से लोग जब हर्षिल तक पहुंचे तो वहां भी पुलिसकर्मियों ने लोगों को रोक दिया। मीलों तक वाहनों का जमावड़ा लगा हुआ था। कम से कम 300-400 वाहन कतार में थे।

ऊपर मुख्यमंत्री अपने नेता आडवाणी जी और एक बाबा के साथ स्पर्श गंगा का कार्यक्रम कर रहे थे, इधर लोग अपनी-अपनी गाड़ियों में ठुंसे हुए गंगा के स्पर्श के लिए तरस रहे थे। गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से आए यात्री इस बात से बिलकुल अनजान थे कि अब गालियां देना भी अपराध है।

एक समय ऐसा आया कि लोगों का धैर्य खत्म हो गया। उन्होंने उधर से आते एक सरकारी अधिकारी की गाड़ी को घेर लिया। दुर्भाग्यवश वह भी हार्टीकल्चर का बंदा निकला। वह दुख मना रहा था कि उसने अपनी गाड़ी पर उत्तराखंड सरकार क्यों लिखा। उसके बाद अवर सचिव की गाड़ी को रोका गया। लोगों की भारी नाराजगी के बाद दस-दस की संख्या में वाहनों को छोड़ा गया।

आडवाणी की सुरक्षा में वहां लगे पुलिसकर्मियों के हाथों में पेड़ों की टहनियां थीं। यानी आडवाणी अगर वहां थे तो वे भी भगवान भरोसे ही थे।

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