शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

वेरियर अल्विन दुनिया की वह बैगा लड़की नहीं रही

जयप्रकाश पाराशर

जब मैंने पत्रिका अखबार में -बमुश्किल नसीब हुए कांधे- शीर्षक से एक छोटी सी खबर पड़ी तो मुझे लगा कि यह किसी बेसहारा और बदनसीब शख्स के बारे में है। वास्तव में यह खबर समूचे मानव इतिहास के एक अध्याय के बारे में थी।

कोसी का हीरो

करीब 102 साल की उम्र में इतनी एकाकी मौत मरने वाली कोसी या कौशल्या बाई महान मानवशास्त्री वेरियर अल्विन की पत्नी थी। वह बैगा आदिवासियों के बारे में लिखी किताब ‘द बैगा’ (1939) की नायिका थी। जब उसकी 23 दिसंबर 2010 को मंडला के करीब रैतपुर में मौत हुई तो बैगा आदिवासियों ने कंधा तक नहीं दिया, क्योंकि कोसीबाई ने एक ऐसे बाहरी आदमी वेरियर अल्विन से गंधर्व विवाह किया था, जिसने अपनी पूरी जिंदगी आदिवासियों की लड़ाई लड़ने में खर्च कर दी थी। ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई करके यह शख्स भारत आया तो पादरी बनकर था और उसका मकसद भी ईसाई मतावलंबियों की संख्या बढ़ाना ही था, लेकिन आदिवासियों की पवित्रता ने उस शख्स का दिल जीत लिया था। चर्च के अलंबरदारों ने उसे मिशनरी छोड़ने को बाध्य कर दिया।

लिहाजा वह ताजिंदगी भारतीय और खासकर मध्य प्रदेश के जंगलों में झोंपड़ियों पर फूंस डालकर रहने वाले आदिवासियों के बीच रहकर काम करता रहा। भारत में जब आदिवासियों के बारे में नीतियां बन रही थीं तो वेरियर अल्विन की उन पर गहरी छाप थी।

अल्विन ही मेरे कैमरॉन


मैं नईदुनिया का शुक्रगुजार हूं कि जब 1990 में वहां गया तो उसकी विशाल लायब्रेरी में वेरियर अल्विन की लिखी और उनके बारे में कई किताबें थीं। यह लायब्रेरी राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर और रनवीर सक्सेना की पसंदीदा किताबों से भरी थी। वेरियर अल्विन के जरिए मध्य प्रदेश के आदिवासियों के संसार को जानना मेरे लिए हॉलीवुड की ‘अवतार’ फिल्म देखने जैसा था। उस समय तो वेरियर अल्विन ही मेरे जेम्स कैमरॉन थे।

अलबत्ता अल्विन के बारे में रामचंद्र गुहा की प्रसिद्ध किताब 'सेवेजिंग द सिविलाइज्ड' नहीं पढ़ पाया हूं, लेकिन कोसीबाई के निधन ने विद्वान लेखकों के लिए एक किताब का विषय फिर दे दिया हैः क्या आदिवासियों के बारे में सरकारी नीतियां विफल हो गई हैं? 1940 में अल्विन से विवाह करने वाली कोसीबाई के बारे में उनकी राय 2010 तक भी नहीं बदल पाई? क्या हमारी सारी पढ़ाई लिखाई ऐसे चार लोग भी पैदा नहीं कर पाई जो कोसीबाई को कंधे देते?

मुझे नहीं मालूम कि मध्य प्रदेश सरकार कोसीबाई के बारे में क्या करेगी लेकिन आदिवासियों के बारे में सरकारों को गंभीरता से चिंतन करने की जरूरत है। आरक्षण और अन्य नीतियों का लाभ अनुसूचित जातियों को तो मिला, लेकिन आदिवासी कहीं न कहीं पिछड़ रहे हैं।

कैसे जिया होगा

जिस रैतपुर गांव में बैगा आदिवासियों ने कोसीबाई को कंधे तक नहीं दिए वह मध्य प्रदेश के मंडला के डिंडोरी से काफी करीब है। डिंडोरी इस लिहाज से ऐतिहासिक है कि बैगा आदिवासियों के जीवन रहस्यों से पर्दा उठाने वाली ‘द बैगा’ किताब यहीं रची गई थी। वेरियर अल्विन छह साल तक यही अध्ययन करते रहे। उनका अध्ययन करने का तरीका भी विलक्षण था। वह अपने विषय में विलीन हो जाते थे। कोसीबाई के साथ छह साल तक रहने के बाद वह चले गए। बाद में उन्होंने एक और विवाह किया था।

जानकारों की मानें तो अल्विन ने कोसीबाई से करीब 1939-40 के दौरान प्रेम विवाह किया था। आप अनुमान लगाइए कि उसने 2010 तक बहिष्कृता का जीवन कैसे जिया होगा?

आदिवासियों की निश्छलता और पवित्रता ने अल्विन को इतना प्रभावित किया था कि एक एंग्लिकन बिशप का बेटा आध्यात्मिक व्यक्ति में तब्दील हो गया था। जो आत्मा की शांति की बातें करता था। उसने आदिवासियों की पवित्रता से सभ्य समाज को रूबरू कराया।

समृद्धि से मजदूर तक

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब तक मैंने वेरियर अल्विन को नहीं पढ़ा था, मुड़ियाओं की घोटुल प्रथा की निर्मलता को मैं बिलकुल नहीं समझता था। नौजवानों को एकसाथ रखकर उन्हें जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता देने का यह अद्भुत आयोजन था। अपने बचपन में मैंने आदिवासियों को कोलतार की सड़कों पर मजदूरी करते हुए देखा था। जहां भी मजदूरों की जरूरत होती थी, मामाओं को सबसे अच्छा समझा जाता था। मैं इस बात से बिलकुल अनजान था कि वे भले ही लंगोटियां पहनते थे, लेकिन निष्कलुष जीवन, सौंदर्यबोध, कला और सांस्कृतिक सम़ृद्धि के मामले में वे कितने आगे थे। जंगलों के राष्ट्रीयकरण ने उनसे उनका समृद्ध संसार छीनकर उन्हें मजदूर मामा बना दिया था।

मुझे पता नहीं क्यों लगता है कि ओशो रजनीश भी वेरियर अल्विन के विचारों से काफी प्रभावित थे। वह आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के हामी थे। वह इस बात से बिलकुल सहमत नहीं थे कि आदिवासियों पर हम अपनी संस्कृति थोपें।

बहरहाल कोसीबाई के निधन और चार कांधे नहीं मिलने की खबर ने मुझे यह सोचने पर बाध्य कर दिया कि वह कौन सी चूक है कि आदिवासी अपने सच्चे दोस्त की भी पहचान नहीं कर सके।

1 टिप्पणी:

  1. Jai prakash ji aapko ek jankari de raha hu ki kosi Bai ka nam koshalya nahi tha or na vah baiga jati ki mahila thi. kosi Bai Pradhan jati ki thi. jis Gram reiyatwari me kosi Bai rahti thi. us goav me baiga janjati ke log nivas hi nahi karte.

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