जयप्रकाश पाराशर
बस्तर से जब आप रायपुर की तरफ निकलते हैं, तो सोनारपाल गांव की दीवारों पर नील से लिखा गया हैः जो भारतीय संविधान में विश्वास नहीं रखता, वो गद्दार है। सोनारपाल की दीवारों पर यह भी लिखा है कि बस्तर आदिवासी क्षेत्र है और संविधान ने आदिवासियों को विशेष अधिकार दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों के ब्योरे भी दीवारों पर लिखे हैं, जो आदिवासियों की सुरक्षा और अधिकारों का जिक्र करते हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि बस्तर की दीवारों पर ही यह सब क्यों लिखा है? देश के अन्य हिस्सों में यह सब क्यों नहीं लिखा गया है। नक्सलवादियों के प्रति लिखे गए ये तमाम संदेश उन भोले भाले आदिवासियों को बहककर हिंसा का रास्ता अख्तियार करने से रोकने के लिए हैं, जिन्हें विश्वास दिला दिया गया है कि एक दिन उनकी सरकार होगी, उनका अपना राज्य, और उसकी प्राप्ति के लिए हिंसक संघर्ष जरूरी है।
जगदलपुर में इंद्रावती के पार नक्सलियों का भय कुछ कम हुआ है, यह आप चित्रकोट जलप्रपात को देखने आई भीड़ को देखकर भी समझ सकते हैं। अब भी सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और भानुप्रतापपुर के अंदरूनी इलाकों से खबरें आती रहती हैं। मुठभेड़ और आत्मसमर्पण। खनिकों की मशीनों और ट्रकों में आगजनी। सड़क किनारे सुरक्षाबलों के ट्रक और सर्चिंग। अज्ञात हथियारबंद लोगों के गांव में आने और ग्रामीणों से भोजन बनवाकर खाने की खबरें भी कभी-कभी आती रहती हैं। चार महीनों को देखें तो सुकमा और दंतेवाड़ा में सबसे ज्यादा मुठभेड़ें हुई हैं। नक्सलियों के प्रमुख कमांडर हिड़मा पर सुरक्षा बलों का फोकस था। उधर सुकमा के जगरगुंडा, चिंतलनार और चिंतागुफा में पापाराव नाम का नक्सली कमांडर सक्रिय है। वहीं अप्पाराव नाम का नक्सली नेशनल हाईवे 30 पर कांकेरलंका की ओर घटनाएं कर रहा है।
जगदलपुर में 24-25 जनवरी को पत्रकारों के संगठन और जिला प्रशासन ने मिलकर एक दिलचस्प परिसंवाद, ‘बस्तरः कल, आज और कल ’ का आयोजन किया। इसमें बस्तर में अब तक कलेक्टर रहे तमाम ब्यूरोक्रेट और कई पत्रकार उपस्थित थे। यह बात सही है कि इसमें उन गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भागीदारी नहीं थी, जो अक्सर नक्सलियों की पक्षधरता के कारण विवाद में रहते हैं। फिर भी जो प्रश्न उठे वे कम महत्वपूर्ण नहीं थे।
- पिछले 12 वर्षों में डॉ. रमनसिंह सरकार ने सड़कों, शिक्षा, स्वास्थ्य और पंचायतों का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में काफी सफलता हासिल की है, लेकिन अबुझमाड़ के अंदरूनी इलाकों में अब भी समस्याएं बरकरार हैं। नक्सलवाद के दौरान करीब 170 सड़कों को ध्वस्त किया गया था। स्कूलों, पुलों और पुलियाओं को ध्वस्त कर दिया गया था। सरकार ने इनको फिर से खड़ा करने के प्रयास किए हैं।
- दंतेवाड़ा में तत्कालीन कलेक्टर ओपी चौधरी ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। जावंगा में उन्होंने एक ऐसा आवासीय विद्यालय विकसित किया जिसमें आदिवासियों के तमाम बच्चों को पूर्ण आवासीय शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गई। इसका सबसे ज्यादा फायदा उन गांवों के बच्चों को मिला, जहां नक्सलवादियों ने स्कूल भवनों को उड़ा दिया था और वे बच्चों के हाथों में बंदूकें थमा रहे थे। इसके अलावा जिनके माता पिता स्वयं नक्सलवादी हो गए थे अथवा नक्सलवादी हिंसा की भेंट चढ़ गए थे। यह संकुल अद्भुत है। इसमें वोकेशनल एजुकेशन की व्यवस्था भी की गई है। लाइवलीहुड कॉलेजों ने उन तमाम बच्चों को आर्थिक विकास की मुख्यधारा में लौटने में मदद की।
- ज्यादातर पूर्व या वर्तमान प्रशासनिक अधिकारी, स्व. डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा, जो ब्यूरोक्रेट से आदिवासियों के सक्रिय नेता में बदल गए थे और जीवन के अंतिम समय तक आदिवासियों के हितों के बारे में सोचते रहे, के विचारों से असहमति दर्ज करा रहे थे। आर परशुराम हों या प्रदीप बैजल अथवा सुनील टंडन, सभी का कहना था कि आदिवासियों को उसी तरह सड़कों, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं, इलेक्ट्रानिक उपकरणों आदि की आवश्यकता है, जैसे हम लोगों को है। इस बारे में संस्कृति का बहाना नहीं लिया जा सकता। पूर्व पुलिस अधिकारी पन्नालाल ने सवाल उठाया कि जब हम संस्कृति बचाने की बात करते हैं तो कौन सी संस्कृति की बात करते हैं। हालांकि जांजगीर-चांपा के वर्तमान कलेक्टर ओपी चौधरी ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि हम कब तक आदिवासियों की पसंद या नापसंद का फैसला करते रहेंगे। अच्छा तो यह होगा कि हम उन्हें यह निर्णय करने में सक्षम बनाएं कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है। हालांकि यह प्रश्न तब भी बरकरार ही रहा कि उन्हें अपना निर्णय करने के लायक बनाने वाली शिक्षा का मॉडल क्या होगा।
- प्रदीप बैजल का कहना था कि यह थ्योरी बस्तर पर लागू नहीं होती है कि कुछ शोषक थे और आदिवासी शोषित थे। और वर्ग संघर्ष की वजह से नक्सलवाद पैदा हुआ। बैजल की राय में छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद आंध्रप्रदेश, झारखंड और उड़ीसा से आया। आंध्र प्रदेश में शोषक और शोषित का मॉडल था। जब नक्सलियों को आंध्र प्रदेश से धकाया गया तो वे बस्तर में प्रवेश कर गए।
- मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह का भी कहना था कि जमीदारों के द्वारा आदिवासियों के शोषण की कहानी बस्तर पर लागू नहीं होती, क्योंकि यह तो पहाड़ी इलाका था। आदिवासियों का अगर कोई राजा या जमीदार था भी तो वह आदिवासियों जैसा ही जीता था। खेती और वनोपज के सहारे ही उसका भी जीवन चलता था। बस्तर में एक सम्मोहन होने की बात मुख्यमंत्री ने की।
- बहुत से टिप्पणीकारों ने माना कि एक विसियस सर्कल बन गया है और अब निहित स्वार्थ का एक वर्ग खड़ा हो गया है, जिसके लिए नक्सलवाद का बना रहना ज्यादा फायदे का काम है। एक पूर्व अधिकारी ने दिलचस्प टिप्पणी की कि हम वही कर रहे हैं, जो एक समय अंग्रेज कर रहे थे। वो भारत से अयस्क और अन्य संपदा ले जा रहे थे, अब हम बस्तर से अयस्क ले जा रहे हैं।
- मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने कहा कि वह अगला परिसंवाद हो तो सुकमा में हो। उनका विचार था कि बस्तर का सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों ने किया है जो अक्सर वहां कारखाने लगाने और विकास कार्य करने का विरोध करते रहे हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी उम्मीद जाहिर की है कि नई माइनिंग नीति के तहत जो माइनिंग फंड बनाए गए हैं, उससे जिलों को स्थानीय स्तर पर बड़ी रकम मिलेगी और यहां स्थानीय स्तर पर विकास को गति दी जा सकेगी।
- एक बात पर लगभग सभी सहमत थे कि स्थानीय स्तर पर कलेक्टरों को नीतियां बनाने, लागू करने और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से परिवर्तन करने की आजादी दी जानी चाहिए।
- श्रोताओं में से किसी ने सवाल उठाया कि यहां आदिवासियों के प्रश्नों पर विचार करने के लिए बाहर से आए ब्यूरोक्रेट्स हैं, पत्रकार हैं, लेकिन खुद आदिवासी क्यों मौजूद नहीं हैं।
अंततः जांजगीर-चांपा के कलेक्टर ओपी चौधरी का वही प्रश्न कि कब तक हम आदिवासियों के बारे में निर्णय करते रहेंगे कि उन्हें अपने लिए क्या करने की जरूरत है।