जयप्रकाश पाराशर
अगर हम मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की विकास यात्रा और मुख्य सचिव अवनि वैश्य की यात्राओं से कुछ निष्कर्ष निकालना चाहें तो सरकार आम आदमी के दरवाजे पर पहुंच चुकी है। लोकतंत्र सूबे के अंतिम आदमी तक पहुंच गया है। एक मामूली आदमी भी सरकारी नीतियों का फायदा उठा सकता है। सरकार के कारिंदे घर-घर जाकर लोगों से उनकी समस्याएं पूछने लगे हैं और तत्काल हल तलाशे जा रहे हैं।
दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो ये यात्राएं क्यों की जा रही हैं?
जब मुख्यमंत्री राज्य की यात्रा करने निकले होंगे तो निश्चय ही वह राज्य का भूगोल जानने तो निकले नहीं होंगे। क्या उन्हें पता नहीं कि लोगों की समस्याएं क्या हैं?
यह कौन नहीं जानता कि भ्रष्टाचार के मामलों में जरा भी कमी नहीं आई है। उनकी सरकार आने के बाद अच्छे शासन की दिशा में कोई चमत्कार नहीं हुआ है। क्या वह सत्ता संभालने के बाद लोगों को सौ फीसदी बिजली मुहैया कराने के लिए कुछ कर पाए हैं? गांव उसी तरह अंधेरे में डूबे रहते हैं जैसे पहले डूबे रहते थे। क्या उनके काम संभालने के बाद औद्योगिक निवेश में इजाफा हुआ है?
किसी गरीब के घर मुख्यमंत्री के पहुंचने का अर्थ यह कतई नहीं है कि लोकतंत्र अंतिम आदमी तक पहुंच गया है। यह लोकतंत्रीकरण की महज शोमैनशिप है। बंजर राजनीति की चतुराईभरी मार्केटिंग है।
सत्ता के तंत्र में एक साधारण आदमी की पहुंच आज भी बहुत कम है। बल्कि प्रशासनिक तंत्र में आम जनता के प्रति संवेदनशीलता घटी ही है। बढ़ी नहीं है।
लोगों को यात्राएं नहीं सुशासन चाहिए। उनकी समस्याओं को ईमानदारी और संवेदनशीलता से हल करने वाले लोग चाहिए।
सच तो यह है कि मुख्यमंत्री का काम झोपड़ियों में जाकर भजन गाना नहीं है, लोगों को झोंपड़ियों से मुक्त करना है। सवाल यह है कि कितने आमफहम लोग बड़ी आसानी से आकर मुख्यमंत्री या मुख्यसचिव तक अपनी बात कह सकते हैं। उनकी नौकरशाही लोगों के प्रति कितनी संवेदनशील है।
मुख्यमंत्री का काम यह सोचना है कि जब बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में तेजी से निवेश बढ़ रहा है तब मध्य प्रदेश जैसे शांत और स्थिर राज्य में निवेश ठप क्यों पड़ा है। स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश के मामले में हम अब भी पिछड़े क्यों हैं।
यात्राएं न स्कूल खोलती हैं, न बिजली बनाती हैं, उनसे न उद्योग कारखाने बनते हैं और न ही रोजगार मिलते हैं। ये टीवी चैनलों के लिए मनोरंजक विजुअल जरूर जुटाती हैं।
जब 1975 बैच के आईएएस अधिकारी अवनि वैश्य मध्य प्रदेश के नए मुख्य सचिव बने और अधिकारियों की बैठकें लेने लगे तो लोगों को लगा कि शायद सुस्त पड़े प्रशासनिक तंत्र से कोई नतीजे निकलने लगेंगे।
सरकारी नीतियों की विफलता का बड़ा कारण देश के डिलीवरी सिस्टम का निकम्मापन है। नौकरशाही एक ऐसे तंत्र में बदल चुकी है जो नेताओं और मंत्रियों के सामने निष्ठा प्रदर्शन के बाद अपना काम पूरा समझ लेती है।
साधारण आदमी के साथ यह तंत्र बड़ी निर्ममता से पेश आता है। जब अधिकारियों के करिकुलम वाइटे बैंकों के लॉकरों से निकल रहे हैं तब यात्राओं की जरूरत नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
अवनि वैश्य अब तक सोए पड़े संवेदनाहीन और भ्रष्ट डिलीवरी सिस्टम को जगा पाएं तो सरकार अपने आप आम आदमी तक पहुंच जाएगी।
जिस पंचायती राज को लोकतंत्र का लोकव्यापीकरण माना जा रहा था, वह भ्रष्टाचार का सबसे सड़ा मॉडल बन चुका है। पंचायतों के लिए धन मंजूर कराने से लेकर योजनाओं को अमली जामा पहनाने तक भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण हो चुका है। आपको एक सामान्य आदमी भी बता देगा कि किस स्तर पर कितना प्रतिशत देना पड़ता है। आश्चर्य की बात है कि यह बात अब तक मुख्यमंत्री और मुख्यसचिव को नहीं मालूम है।
यह यात्राओं का नहीं कुछ कर गुजरने का वक्त है।
मुख्यमंत्री को यह भी देखना चाहिए कि मध्य प्रदेश छोटे-बड़े अपराधों का गढ़ बन गया है. राज्य का एक प्रमुख शहर इंदौर नेशनल क्राम रिकॉर्ड ब्यूरो की पिछली रिपोर्ट में देश के सभी कुख्यात शहरों को पीछे छोड़ चुका है. आम लोगों ने मान लिया है कि अब कभी भी कहीं भी किसी के साथ भी कुछ भी हो सकता है.
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