जयप्रकाश पाराशर
मल्टीब्रांड खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी
विदेशी कंपनियों को सीधे निवेश की अनुमति के विधेयक पर लोकसभा और राज्य सभा में जो कुछ
हुआ उसे अगर राजनीतिक जंग कहा जाए तो कांग्रेस ने फिलहाल यह जंग जीत ली है। यह जंग
सैनिक इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि सेनापतियों को यह जंग लड़ते हुए दिखना जरूरी लगता था।
एफडीआई पर बहस के दौरान छोटे-छोटे कई नाटकों और एकांकियों
का मंचन हुआ, जिनकी स्क्रिप्ट या तो पहले ही लिख ली गई थी या वे क्षणिक उत्तेजना की पैदाइश थे। मंच के पीछे तक प्रहसन खेले गए, जो किरदारों की भावभंगिमाओं के परे व्यावहारिक वास्तविकताओं पर आधारित थे। वामपंथियों, जो स्वयं बदली परिस्थितियों में अपने वैचारिक दायरे से बाहर जाकर सोच पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं, को छोड़ दिया जाए, तो सारे
राजनीतिक दल या तो खुद भ्रम में थे या किसी तरह जनता को अललटप्प जानकारियों व
निष्कर्षों से भरमा रहे थे।
जोर-शोर से भाषण देने वाले कई नेता अपनी पार्टियों के कैदी लग
रहे थे।
लाइन का कंफ्यूजन
प्रत्येक दल में एफडीआई पर एक राय नहीं थी और कोई भी पूरे
आत्मविश्वास से यह कहने में सक्षम नहीं लग रहा था कि अगले चुनाव में इस मुद्दे पर
जनता क्या व्यवहार करने वाली है। भाजपा को परंपरागत रूप से व्यापारियों का समर्थन
मिलता रहा है और वह उसी अनुमान के आधार पर मल्टीब्रांड में एफडीआई के विरोध की
लाइन ले रही थी।
कांग्रेस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी
चिदंबरम और वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा जहां विधेयक के पक्ष में दिखाई दे रहे थे
वहीं मणिशंकर अय्यर और कपिल सिब्बल जैसे नेता दुविधा में थे। कपिल सिब्बल, जो व्यापारी
बहुल चांदनी चौक से सांसद हैं, कोई स्पष्ट लाइन लेने से बच रहे थे। कांग्रेस के
भीतर वामपंथी रुझान रखने वाले अनेक नेता भारी दुविधा में दिखाई देते रहे। दिग्विजय सिंह भले ही संसद के बाहर मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई को फायदेमंद बता रहे थे, लेकिन कांग्रेस में ऐसे लोगों की कमी नहीं थी, जो खुद को असमंजस में पा रहे थे।
दोष किस पर मढ़ें
खुद आनंद शर्मा गांधीवादी औद्योगिक विचारों की महानता और रिटेल में विदेशी निवेश की अपरिहार्यता का जबर्दस्त फार्मूला रचने की कोशिश करते देखे गए। एक तरफ कांग्रेस
अपनी गरीबों और आम आदमी की तारणहार छवि को बरकरार रखने का संघर्ष कर रही थी, दूसरी
तरफ आर्थिक उदारीकरण के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की उसकी मजबूरी चेहरों पर झलक रही थी। मुल्क की आर्थिक
स्थिति बिगड़ी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मुश्किल में है। देश ट्रेड डेफिसिट, राजकोषीय घाटे, घटते राजस्व, घटते निर्यात के वैसे संकट की तरफ बढ़ रहा है। कांग्रेस इस संकट के लिए भी किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकती
क्योंकि पिछले आठ साल से एक अर्थशास्त्री के नेतृत्व में उसकी सरकार है, जिसने
यूपीए-2 में तो आर्थिक सुधारों को जैसे ठप ही कर दिया था और वह आर्थिक विकास के लिए अति महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में विफल रही। उसके ज्यादातर नेता यह
बताने में विफल रहे कि मल्टीब्रांड खुदरा में एफडीआई से गरीबों और आम आदमी को
फायदा कैसे मिलने वाला है?
एक टीवी शो में तो बड़ी दिलचस्प स्थिति देखने को मिली। कांग्रेस
के मणिशंकर अय्यर आर्थिक उदारीकरण के मामले में दबे-सहमे वामपंथी लग रहे थे और
भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य पीयूष गोयल आर्थिक उदारीकरण के बड़े पैरोकार लग रहे थे, जबकि संसद में
दोनों के दलों की स्थितियां एकदम उलट थीं। मणिशंकर अय्यर ने तो कहा भी कि हम अपनी
पार्टियों के कैदी हैं। बिहार के एक सांसद उपेंद्र राय ने तो राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा ही दे दिया।
बिचौलियों का गुणगान
भारतीय जनता पार्टी, जिसकी सरकार ने कभी मल्टीब्रांड रिटेल
की अवधारणा पर विचार किया था और जो एनएडीए सरकार में उदारीकरण की बड़ी पैरोकार थी, आढ़तियों और बिचौलियों का गुणगान करती दिखाई दे रही थी। लोकसभा में प्रतिपक्ष
नेता सुषमा स्वराज के भाषण से तो एक समय ऐसा लग रहा था कि पूरे देश की साधारण जनता को
बिचौलियों, सूदखोरों, दलालों और आढ़तियों का अहसान मानना चाहिए कि उनके सहयोग से वे अपना
सामाजिक जीवन चला पा रहे हैं। सच तो यह है कि कर्ज बांटने वाले या उधार पर माल बेचने वाले सूदखोरों और
बिचौलियों ने सैंकड़ों साल तक भारतीय किसानों और साधारण लोगों का ऊंची ब्याज दरों
और मनमानी कीमतों के जरिए शोषण किया है। यहां भी सुषमा स्वराज अपनी पार्टी की कैदी
थी।
खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति लगातार बढ़ रही है और खेत से
चलने वाला उत्पाद बिचौलियों के कारण कई गुना महंगा होकर उपभोक्ता तक पहुंच रहा है।
जिस पर किसी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। जमाखोरी और कीमतों में मनमानी वृद्धि को रोकने में राज्य सरकारें भी विफल रही हैं। यह संदेहास्पद है कि खुदरा में
विदेशी निवेश इस महंगाई या मुनाफाखोरी को समाप्त कर देगा।
सबसे बड़े कैदी
आप बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को सरकार के
समर्थन में लाने का श्रेय कमलनाथ को देना चाहते हैं तो यह आपकी उदारता है। सपा नेताओं ने संसदीय सत्र आरंभ होने के पहले ही संकेत दे दिए थे कि उनकी पार्टी एफडीआई का
विरोध तो करेगी लेकिन सरकार नहीं गिरने देगी। बसपा तो राज्यसभा में एफडीआई के खुलकर समर्थन में ही आ गई।
मल्टीब्रांड खुदरा में एफडीआई के खिलाफ जोर-जोर से भाषण देने के बाद आप ठीक वोटिंग से पहले बर्हिगमन कर जाएं अथवा एक सदन में विरोध करें और दूसरे में समर्थन करने लगें तो इसे आप क्या कहेंगे?
जाहिर है कि मुलायमसिंह यादव सरकार को गिराने का कोई दोष अपने सिर नहीं लेना चाहते हैं। वह एक ऐसे मौके की तलाश में हैं जब यूपीए सरकार को गिराया जा सके। वे एक ऐसा समय तलाश रहे हैं जहां से उनकी सरकार उत्तर प्रदेश में अलोकप्रिय होना शुरू कर देगी। रिटेल में एफडीआई में मायावती की जरा भी दिलचस्पी नहीं है। वह कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई तो इसका कारण भी सुषमा स्वराज से नाराजगी तो कतई नहीं थी। इन दलों के नेता सबसे बड़े कैदी हैं क्योंकि वे अपने सुप्रीमो की लाइन से बाहर जाकर कुछ कहने की जुर्रत नहीं कर सकते।
मल्टीब्रांड खुदरा में एफडीआई के खिलाफ जोर-जोर से भाषण देने के बाद आप ठीक वोटिंग से पहले बर्हिगमन कर जाएं अथवा एक सदन में विरोध करें और दूसरे में समर्थन करने लगें तो इसे आप क्या कहेंगे?
जाहिर है कि मुलायमसिंह यादव सरकार को गिराने का कोई दोष अपने सिर नहीं लेना चाहते हैं। वह एक ऐसे मौके की तलाश में हैं जब यूपीए सरकार को गिराया जा सके। वे एक ऐसा समय तलाश रहे हैं जहां से उनकी सरकार उत्तर प्रदेश में अलोकप्रिय होना शुरू कर देगी। रिटेल में एफडीआई में मायावती की जरा भी दिलचस्पी नहीं है। वह कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई तो इसका कारण भी सुषमा स्वराज से नाराजगी तो कतई नहीं थी। इन दलों के नेता सबसे बड़े कैदी हैं क्योंकि वे अपने सुप्रीमो की लाइन से बाहर जाकर कुछ कहने की जुर्रत नहीं कर सकते।
लोकतंत्र की कैद
विकास दर के अनुमान लुढ़कते हुए 5.5 फीसदी पर आ गए और
औद्योगिक विकास के तिमाही आंकड़े (आईआईपी) तेजी से गिर रहे हैं। देश को गरीबी
कम करनी है और लोगों के लिए रोजगार पैदा करने हैं, लेकिन यह काम विकास दर बढ़ाए
बिना संभव नहीं है। भाषणों से तो यह काम हो नहीं सकता।
राजनीतिक दल अपने चुनावी गणितों की कैद में हैं। और चुने
हुए लोग अपनी पार्टियों की कैद में। यह मुल्क कैदियों के रहमोकरम पर है।