शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

जमीन किसी फैक्ट्री में नहीं बनती

केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों की जमीनों पर अतिक्रमण धड़ल्ले से जारी है। यह बेतरतीब बसाहटों, ट्रैफिक जाम और पर्यावरण की समस्याओं को जन्म दे रहा है। अब अतिक्रमण रोकने के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाने की जरूरत।

जयप्रकाश पाराशर

देश में केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों, पंचायतों की जमीनें बुरी तरह से अतिक्रमण की चपेट में हैं। नेता और बाहुबली मिलकर महत्वपूर्ण जमीनों पर कब्जे कर रहे हैं। झीलों, नदियों और पोखरों के कैचमेंट (जलग्रहण क्षेत्र) अतिक्रमण के शिकार बन रहे हैं। पहाड़ों और राजमार्गों के किनारे की जमीनों पर अवैध निर्माण किए जा रहे हैं। गांवों और कस्बों के तालाबों व छोटी-छोटी जलप्रणालियों को अतिक्रमण निगल गया है। जंगलात, रेलवे और रक्षा विभागों की जमीनें भी भारी अतिक्रमण की चपेट में है। शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों और नगर निगमों की जमीनों पर स्थानीय नेताओं और उनके साथ जुड़े भूमाफियाओं ने कब्जे जमा लिए है। कस्बों और शहरों के नाले-नालियां जो जल निस्तारण की अहम वाहिकाएं थे, अब गायब हो गए हैं। चरागाहों को पंचायतों के रसूखदार तेजी से चर रहे हैं। अतिक्रमणों को बचाने के लिए धार्मिक स्थल रातों रात खड़े कर दिए जाते हैं।

लोग यह भूल गए हैं कि जमीन फैक्ट्री में नहीं बनती। अंधाधुंध अतिक्रमण से पर्यावरण का गंभीर संकट जन्म ले रहा है।

कौन कर रहा है अतिक्रमणः

आमतौर पर अतिक्रमण नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की शह पर होते हैं। स्थानीय नेता, दबंग, सत्ताधारी वर्ग और गुंडे व बाहुबली इन अतिक्रमणों के पालक-पोषक हैं। राजनीतिक व्यक्ति इन अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने से बचते हैं। सत्ताधारी नेताओं ने देश में अनेक तालाबों को भर दिया है। कई बड़े-बड़े तालाब तेजी से सिकुड़ रहे हैं या उनका नामोनिशान तक नहीं बचा है। नालों पर कांक्रीट संरचनाएं खड़ी हो गई हैं। कई बड़े शहरों में इलाके के रसूखदार लोगों के इशारे पर झुग्गी बस्तियां बसाई जाती हैं और इन झुग्गियों से किराया भी वसूला जाता है। कई बड़े नेता इन झुग्गियों को अपने वोटबैंक को ध्यान में रखकर बसाते हैं और झुग्गियों की आड़ में अपने अवैध कारोबारों का विस्तार किया जाता है। कभी सरकार अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई करती भी है तो आठ दिन बाद फिर लोग उन्हीं जगहों पर काबिज हो जाते हैं।

सामाजिक विघटनः

अतिक्रमणों का विस्तार केवल इसलिए नहीं हो रहा कि लोग ग्रामीण इलाकों से कामकाज की तलाश में शहर आ रहे हैं और वे खाली जगह देखकर कहीं भी बस जाते हैं, बल्कि यह सुनियोजित धंधा है, जिसे राजनीतिक प्रश्रय है। गांवों में भी चरागाहों और जलसंरचनाओं के कैचमेंट पर अतिक्रमण हो रहे हैं। अतिक्रमण की असली वजह यह है कि जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। जमीन का निर्माण नहीं होता। बल्कि वर्तमान अर्थव्यवस्था में जमीन एकमात्र कमोडिटी है, जो फैक्ट्री में नहीं बनती। जमीनों की कीमतें बढ़ने के साथ ही लोगों ने किसी भी शहर, कस्बे या गांव की महत्वपूर्ण जमीनों पर कब्जे करना शुरू कर दिया था लेकिन अब यह महामारी बन चुकी है। छोटी-छोटी झुग्गियों के पट्टे बांटना और एकबत्ती कनेक्शन जैसी नीतियां सामाजिक विघटन को बढ़ावा देती हैं क्योंकि गंदी बस्तियां उन्हें एक मानवीय गरिमा से वंचित करने के साथ ही अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहने के लिए बाध्य कर देती हैं। सड़कों, बाजारों, नालियों, खेल के मैदानों, स्कूल की जमीनों, चारागाहों, मेले के मैदान जैसे वे तमाम सार्वजनिक स्थान किसी न किसी अतिक्रमण के शिकार हो चुके हैं, जहां लोग सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सेदारी किया करते थे।

राजनीति क्यों देती है प्रश्रयः

वास्तव में कोई सी भी सरकारें हों वे गरीबी और आवास समस्या का निराकरण करने में विफल रही हैं। अपना वोटबैंक पक्का करने के लिए लोगों को कहीं भी पट्टे देने और एकबत्ती कनेक्शन देने जैसी घोषणाएं कर दी जाती हैं। इस तरह एक सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेती है। ये पट्टे और एकबत्ती कनेक्शन लोगों को जिंदगीभर नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य करते हैं। सरकारें हर बार उनके इस नारकीय जीवन को अपनी उपलब्धियों की तरह पेश करती है। शहरों के बीचोंबीच जहां ट्रैफिक का तेज कारवां गुजरता रहता है, वहां पैर फैलाने लायक जगह में सात-आठ लोगों का परिवार रहता है।

पर्यावरण का संकटः

जलसंरचनाओं का नष्ट होना, ग्रीन बेल्ट पर अतिक्रमणकारियों के पर्यावरण-विरुद्ध कामों और तालाब व पहाड़ों की जमीनों पर कब्जे मिलकर आगामी वर्षों में गंभीर पर्यावरणीय संकट को न्योता दे रहे हैं।

राष्ट्रीय आयोग बनेः

अब अतिक्रमण रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक आयोग बनाने की जरूरत है, जो राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना लगातार अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई करता रहे। यह आयोग सरकारी विभागों की जमीनों को चिन्हित करे और उन्हें वापस दिलाने में मदद करे तभी इन सार्वजनिक हित की बेशकीमतीं जमीनों को बचाया जा सकेगा। पहाड़ों, झीलों, सड़कों, नाले-नालियों और जलप्रणालियों को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक निकाय का गठन करना लाजिमी है, जिसमें विभिन्न विभागों के लोगों को रखा जाए और अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध कड़े कानूनों को बनाया व लागू किया जाए।