बजट 2010-11 में सामाजिक क्षेत्र पर ज्यादा खर्च, रियायतों के रोलबैक और मुद्रास्फीति की ऊंची दर के संकेत
जयप्रकाश पाराशर
वर्ष 2010-11 के बजट में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी सड़क के बीचो-बीच खड़े हैं। न उनके पास ज्यादा उदारताएं हैं और न ही कठोर कदम। संसद के बाहर एकजुट खड़ा विपक्ष उन्हें महंगाई को लेकर घेर रहा है तो अर्थशास्त्री राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति के खतरों से आगाह कर रहे हैं।
एक तरफ उनके पास भारतीय अर्थव्यवस्था के छलांगे मारने की अनंत संभावनाएं हैं और दूसरी तरफ खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों से उपजती अलोकप्रियता है। बजट के बाद यह पक्का हो गया है कि मुद्रास्फीति 10 फीसदी के आसपास पहुंचने वाली है।
अच्छी बात यह है कि सरकार इस उम्मीद में सामाजिक क्षेत्र पर बड़ा खर्च कर रही है कि बड़ी संख्या में रोजगार पैदा होंगे, मानव संसाधन का विकास होगा और लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा।
दुविधा एकः
खाद्य पदार्थों की कीमतों को बढ़ने से आप नहीं रोक सकते अगर पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क व सीमा शुल्क में इजाफा करते हैं, लेकिन आपके पास खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने का कोई उपाय नहीं है। प्रणब दा ने सिर्फ डीजल को छोड़ दिया होता तो महंगाई से कुछ हद तक बचा जा सकता था। समस्या यह है कि वह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ज्यादा अंतर नहीं रख सकते।
पेट्रोल व डीजल पर उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क में वृद्धि वास्तव में वृद्धि नहीं है। यह रियायतों का रोलबैक है। ऐसा ही रोलबैक कारों पर उत्पाद शुल्क में दो फीसदी का है।
दादा की दुविधा यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में रिकवरी को लेकर वह खुद भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। एक तरफ राजकोषीय घाटे को सीमित रखना है तो संसाधन जुटाने हैं और दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था को दस फीसदी पर ले जाने का स्वप्न है। इसमें दादा को भाग्य की तलाश है।
दुविधा दोः
टैक्स संरचनाओं में फेरबदल का जहां तक सवाल है प्रणब मुखर्जी की नजर 2011 पर है। भारतीय टैक्स प्रणाली में 2011 में व्यापक बदलाव दिखाई देंगे। नया टैक्स कोड और जीएसटी 2011 में लागू होंगे। कर प्रणाली में दिखाई देने वाली तरह-तरह की रियायतें खत्म होंगी। कर प्रशासन की लागत में कमी आएगी क्योंकि कर अदा करने की व्यवस्था सरल हो जाएगी।
लांग टर्म कैपिटल गैन टैक्स अगले वर्ष में बुक कर लीजिए क्योंकि 2012 में आपको काफी भुगतान करना पड़ सकता है।
यह समझ नहीं आता कि जब 2011 में कई रियायतें वापस ले ही रहे हैं तो मिनिमम आल्टरनेटिव टैक्स (मैट) 15 फीसदी से बढ़ाकर 18 फीसदी करने की क्या जरूरत थी। कंपिनयों को अगले साल के लिए 20 फीसदी ज्यादा मैट चुकाना होगा।
शेयर बाजार के उछलने से खुश होने वाले लोगों को पहले मैट का हिसाब लगा लेना चाहिए क्योंकि रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंफोसिस जैसी तमाम कंपिनयों के लाभ के मार्जिन घटने वाले हैं। ऐसा लगता है कि दादा राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए यह कदम उठाने पर मजबूर हुए।
मैट उन कंपिनयों पर लगता है जो मुनाफा तो खूब कमाती हैं लेकिन कई रियायतों का लाभ लेकर टैक्स नहीं देतीं। डिवीडेंड भी अच्छा खासा देती हैं लेकिन देश को राजस्व नहीं देतीं। पी चिदंबरम ने इस औजार की खोज की और प्रणब मुखर्जी को यह काफी पसंद आ रहा लगता है।
दादा शायद कंपनियों को पूरी तरह निराश नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने कंपनी जगत को कार्पोरेट सरचार्ज 10 फीसदी से घटाकर 7.5 फीसदी कर दिया है।
दुविधा तीनः
व्यक्तिगत आयकर में प्रणब मुखर्जी ने जो भी बदलाव किए वे 4 लाख रुपए सालाना से ज्यादा आमदनी वाले लोगों को फायदा पहुंचाएंगे।
इसके दो अर्थ हैं।
एक, वित्तमंत्री इस तरह कंज्यूमर ड्यूरेबल आइटम या ऊंचे मूल्य वाली उपभोक्ता वस्तुओं (जैसें कारें, एलसीडी, वाशिंग मशीन, फ्रिज आदि) की मांग बनाए रखना चाहते हैं। यानी अगर वे रियायतों का रोलबैक कर रहे हैं तो दूसरी तरफ ऊंची आमदनी वालों के हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा धन दे रहे हैं।
दो, तमाम वित्तमंत्रियों की तरह शहरी मध्य वर्ग को खुश रखना चाहते हैं ताकि वह पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से नाराज न हो। पिछले लोकसभा चुनाव में शहरी मध्य वर्ग ने भाजपा का दामन छोड़कर कांग्रेस को वोट दिए हैं।
समस्या यह है कि 3-4 लाख रुपए तक की आमदनी वाले नौकरीपेशा लोगों को कोई फायदा नहीं है। उन पर महंगाई की मार बढ़ने वाली है।
दुविधा चारः
प्रणब मुखर्जी ने बैंकों के लिए जो बजट प्रस्ताव दिए हैं, वे बैंकिंग उद्योग की गैर उत्पादक संपत्तियों (एनपीए) को कम करने में मदद करेंगे। साथ ही भारतीय उद्योगों में भविष्य में कर्ज की मांग बढ़ेगी और बैंकों के क्रेडिट की रफ्तार में सुधार आएगा। यह कदम देश के उद्योग धंधों को मदद पहुंचाएगा।
दादा की मुश्किल यह है कि वह तो निजी बैंकों के लाइसेंस एक बार फिर देना चाहते हैं लेकिन रिजर्व बैंक तैयार नहीं है। कुमारमंगलम बिड़ला, अनिल अंबानी और मालविंदर सिंह (रेलीगेयर) जैसे उद्योगपति बैंकों के लाइसेंस के लिए जोर लगा रहे हैं।
दुविधा पांचः
होम लोन पर सब्सिडी मार्च 2011 तक बढ़ाकर मुखर्जी देश में आवास की समस्या को रेखांकित करते दिखाई तो देते हैं। फिर भी ज्यादा संख्या में मकान बनाने की दिशा में कोई फिस्कल उपाय नहीं किए हैं।
जहां तक ब्याज दरों का सवाल है, अगले कुछ महीनों तक बैंक शायद ही ब्याज दरें बढ़ाएं। कर्ज की मांग बढ़ाने के प्रयास किए जाएंगे।
देखना यही है कि रिजर्व बैंक कैसे मौद्रिक नीति का प्रबंधन करता है। ब्याज दरों, कीमतों और डॉलर के प्रवाह पर उसे काफी कौशल दिखाना पड़ेगा।
बहुत खूब...अच्छी बजट समीक्षा है. दादा की दुविधाएं दरअसल दादा की मजबूरियां भी हैं और कहीं-कहीं बेशर्मियां भी. गठबंधन की राजनीति उन्हें ज्यादा साहस दिखाने का मौका नहीं देती. महंगाई रोकने का पाखंड करते-करते वे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उलझ गए. ये कीमतें सोनिया गांधी को महान बनाने के काम आएंगी. सोनिया की पहल पर कुछ रोलबैक हो सकते हैं...
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