अब आप उस अक्लमंदी को क्या कहेंगे जिसे 25,000 लोगों की मौत पर भी किसी के भावुक होने से एतराज हो? आप एंडरसन को नहीं छोड़ते तो क्या अमेरिका परमाणु बम डाल देता? और जहरीली गैस लीक होने के अपराध में एंडरसन व केशुब महिंद्रा को नहीं पकड़ा जाएगा तो क्या यूनियन कार्बाइड के फोरमैन को पकड़ा जाएगा?
कहा जाता है कि अक्लमंद लोग हमेशा सही पाले में होते हैं। जब देश में ज्यादातर लोग भोपाल गैस त्रासदी की केस त्रासदी पर अपने सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ गुस्से से भरे हुए थे, कमजोर लोगों की मुट्ठियां तनी हुई थीं, तब कुछ अक्लमंद लोग भारत सरकार के 1984 में एंडरसन को सुरक्षित भेजने के फैसले को भारतीय इतिहास का सबसे अच्छा फैसला ठहराने में लगे हुए थे। जो एंडरसन को छोड़ने की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें भावुक विलाप करने वाला बताया जा रहा है।
देश बच गया?
कुछ मित्रों ने तो ऐसा माहौल बना दिया है कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने वारेन एंडरसन को भारत से सुरक्षित बाहर निकालकर एक तरह से देश पर अहसान ही किया है। अगर राजीव सरकार ऐसा नहीं करती तो अमेरिका पहले ही हिरोशिमा बन चुके भोपाल पर परमाणु बम और डाल देता। यानी आप अगर एंडरसन को पकड़कर भोपाल की किसी कोठरी में बंद कर देते तो रोनाल्ड रीगन हिंद महासागर में बेड़ा उतार देते। आखिर रीगन बहुत अहंकारी आदमी जो थे।
अमेरिकी पैराट्रूपर भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में उतरकर एंडरसन को छुड़ा ले जाते तो हमारी क्या इज्जत रह जाती। इसलिए यह बड़ी अक्लमंदी का फैसला था कि हमने खुद ही एंडरसन को सुरक्षित अमेरिका पहुंचा दिया। हम अपने नेताओं के शुक्रगुजार हैं कि एक फैसले से पूरा देश बच गया।
तरक्की का गणित
अक्लमंद लोग हम गुस्से वालों को समझा रहे हैं कि अमेरिकी निवेश पर कितना बुरा असर पड़ता।
हकीकत कुछ और है। वास्तव में भारत में अमेरिकी निवेश बड़ी मात्रा में 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद ही आया है।
यह बात सही है कि 1982 से 1988 के दौरान भारत का अमेरिका को निर्यात 110 फीसदी बढ़ा। फिर भी अमेरिका के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी 1988 (यानी गैस कांड के चार साल बाद) में केवल 0.7 फीसदी थी। भारत से सबसे ज्यादा आयात करने वाला देश तब भी सोवियत संघ ही था। अमेरिका भारत में अपने पूंजीगत माल, टेक्नोलाजी और अन्य वस्तुओं का निर्यात करने के लिए दबाव बनाए हुए था। वास्तव में अमेरिका को भारत में बढ़ते बाजार की असीम संभावनाएं दिखाई दे रही थीं।
आर्थिक संभावनाओं का तर्क देने वालों को यह जानकर बड़ा झटका लगेगा कि 1984 में एंडरसन को सुरक्षित पहुंचाने के बाद भी 1984 से 1987 के दौरान अमेरिका से भारत को निर्यात में 8 फीसदी की गिरावट आई। 1988 में जाकर अमेरिका से भारत को निर्यात 70 फीसदी बढ़ा वह भी ट्रांसपोर्ट उपकरणों और अनाज के क्षेत्र में।
यह बात सही है कि अमेरिकी निवेश भारत में 1985 के बाद ही बढ़ना शुरू हुआ लेकिन हमने विदेशी पूंजी के प्रस्तावों को मंजूरी देना भी तभी शुरू किया। 1985 के पहले भारत की सरकारें सालभर में केवल 51 निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दे रही थीं, लेकिन राजीव गांधी के शासनकाल में सरकार 194 निवेश प्रस्तावों को हर साल मंजूरी दे रही थी। अमेरिका अपनी विकास दर बनाए रखने के लिए निवेश करने को छटपटा रहा था। 1985 से 1988 के बीच अमेरिकी निवेश का सालाना औसत 3.59 करोड़ डॉलर था। लेकिन गैस त्रासदी के चार साल बाद यह दोगुना हो गया।
दांव पर क्या था
यानी आप कहें कि 1984-85 में अमेरिका के साथ भारत के कोई बड़े आर्थिक हित दांव पर लगे थे तो यह कुछ ज्यादा ही आशावादी होना है।
अमेरिकी सहायता भी कोई दांव पर नहीं लगी थी। 1966 में भारत को 90.2 करोड़ डॉलर की विकास सहायता अमेरिका दे रहा था, लेकिन 1988 में यह सहायता घटकर केवल 13.3 करोड़ डॉलर रह गई थी। और विकास सहायता तो इसमें नाम मात्र की 2.2 करोड़ डॉलर थी। आजकल इतने में तो एक युद्धक विमान भी नहीं आता।
अक्टूबर 1989 में (एंडरसन को सुरक्षित छोड़ने के पांच साल बाद) अमेरिका के विदेश विभाग ने भारत के साथ हुए सभी वैज्ञानिक सहयोग करारों का पुनरीक्षण कराने का आदेश जारी कर दिया था। मई 1989 में भी अमेरिका ओमनीबस ट्रेड एक्ट 1988 के तहत भारत पर प्रतिबंध की धमकियां दे चुका था। वह भारत को उस समय भी एफडीआई और बीमा उद्योग के दरवाजे खोलने के लिए धमका रहा था।
अमेरिका उस समय भी भारत के सामाजिक कार्यक्रमों को बड़ी मात्रा में धन मुहैया कराने वाले जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का एकाधिकार खत्म करना चाहता था।
तनी मुट्ठियों की ताकत
जब भारत के ज्यादातर अक्लमंद लोग अमेरिका में पढ़ाई करने या नौकरी करने चले गए थे, तब तनी हुई मुट्ठियों वाले लोगों ने ही भारत का भाग्य बदला। वह देसी प्रतिभा सस्ती थी, लेकिन विलक्षण थी। उसने अपनी हर उपलब्धि अपनी हैसियत दिखा देने के लिए हासिल की। उसने राकेट बनाए, मिसाइलें और परमाणु विस्फोट किए, अंतरिक्ष कार्यक्रमों आज भले ही ओबामा सहयोग की बात कर रहे हैं लेकिन आरंभ में उसका सहयोग सीमित था।
एपीजे अब्दुल कलाम की जीवनी पढ़कर पता लग जाएगा कि मिसाइल बनाने के लिए वह खुद किस हद तक जुनूनी थे। साधारण वेतन पाने वाले वैज्ञानिकों ने अपना सुपर कंप्यूटर बना डाला, जब अमेरिका ने उसे तकनीक देने से इनकार कर दिया। जब ओबामा अमेरिका से भारत को मिलने वाले आउटसोर्सिंग कारोबार को समेटने की कोशिशें कर रहे हैं, तब भारतीय टेकीज उद्यमियों में बदल रहे हैं।
भारत में गुस्से का गणतंत्र सत्ताधारियों को जमीन पर ला देता है। सर्वे एजेंसियों के सर्वे धरे रह जाते हैं। अब आप हमारे 25,000 लोग मार दें और हम गुस्सा भी न करें।
अन्याय के पक्ष में खड़ी अक्लमंदी के मुकाबले न्याय का पक्ष लेने वाली भावुकता अच्छी है।
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