क्या भारत में चुनाव केवल भावनात्मक मुद्दों पर ही जीते जाते हैं?
क्या विकास का चुनाव
में कोई महत्व नहीं है? क्या नौजवान भारत भावनाओं में बहने के लिए तैयार है ?
जयप्रकाश पाराशर
जब 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हुई देश में लोग टेलीविजन के सामने
बैठकर घंटों आंसू बहाते रहे। नौजवान राजीव गांधी को जनता ने 533 में से 414 सीटों का ऐसा अभूतपूर्व
समर्थन दिया, जो कभी किसी को नहीं मिला। इंदिरा गांधी की टेलीवाइज्ड अंत्येष्टि ने
लोगों को बूथ तक जाने और राजीव गांधी को असाधारण बहुमत देने के लिए प्रेरित किया।
श्रीपेरुंबुदूर में राजीव गांधी की1991 में हत्या हुई। पीवी नरसिंह
राव को सरकार बनाने का मौका मिला और बाद में उन्होंने सरकार में रहते हुए ही बहुमत
हासिल कर लिया।
लालकृष्ण आडवाणी ने रामजन्मभूमि का जो आंदोलन छेड़ा वह आगे चलकर
1998 और 1999 में भारतीय जनता पार्टी की पहली बार केंद्र में सरकार बनवाने में मददगार
साबित हुआ।
गुजरात में नरेंद्र मोदी गोधरा और उसके बाद हुए दंगों के दौरान
ध्रुवीकरण करने में कामयाब हुए और वे लगातार सरकारें बनाने में कामयाब हुए।
सवाल उठता है कि क्या 2013 के विधानसभा चुनावों और 2014 के लोकसभा
चुनावों में ऐसे कोई भावनात्मक मुद्दे होंगे जो पार्टियों को चुनाव जिता सकें?
भावनाओं के ज्वार के मुद्दे
यह बात सही है कि भावनात्मक मुद्दे अब भी बरकरार हैं। लेकिन मुझे इस
बात में संदेह है कि वे मुद्दे चुनाव जिताने में सक्षम हैं। हमने देखा कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की क्या स्थिति हुई। रामजन्मभूमि आंदोलन के पूरे ध्रुवीकरण के बावजूद भारतीय जनता पार्टी कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी।
अन्ना हजारे-केजरीवाल ने जब लोकपाल का आंदोलन छेड़ा, एक बड़ी भीड़ जमा
हुई। भावनात्मक उबाल आया और थोड़े समय में ही लोग गायब हो गए। उस समय लगा कि
केंद्र की सरकार न गिर जाए। उनके कई सहयोगी दल तक कांग्रेस के खिलाफ बयानबाजी करने
लगे थे। अब उनके स्वर फिर बदल गए हैं।
दिल्ली में जब दामिनी या निर्भया बलात्कार कांड हुआ लोगों में
भावनात्मक ज्वार पैदा हुआ। लोग सड़कों पर निकले और वह भीड़ उसी तरह अज्ञात में
विलीन हो गई।
जहां पहले ज्वार में अन्ना हजारे नेतृत्व की भूमिका में थे, दूसरे
ज्वार में भीड़ नेतृत्वविहीन थी। किंतु दोनों के ही नेपथ्य में भारतीय जनता पार्टी
के समर्थकों का एक वर्ग शामिल था। वह गोपनीय ढंग से इन आंदोलनों का समर्थन कर रहा
था ताकि इन्हें गैरराजनीतिक दिखाया जा सके।
अब भी पार्टियां इन चुनावों में उन मुद्दों की खोज कर रही हैं जो
भावनात्मक रूप से आंदोलित कर सकें। हाल ही में विश्व हिंदू परिषद ने चौरासी कोसी
यात्रा के जरिए हिंदुओं में भावनात्मक ज्वार पैदा करने का प्रयास किया लेकिन उसे
ज्यादा सफलता नहीं मिली।
बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की शासित राज्य सरकारें बर्खास्त की गईं और भाजपा उन राज्यों में अगले चुनावों में नहीं लौट पाईं।
बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की शासित राज्य सरकारें बर्खास्त की गईं और भाजपा उन राज्यों में अगले चुनावों में नहीं लौट पाईं।
विकास अब अहम मुद्दा
जो लोग मानते हैं कि भावनाएं ही चुनाव जीतने में मदद करती हैं, उनके
लिए रीयलिटी चैक का समय है। भारत में नौजवान वोटर की बड़ी तादाद शामिल हो रही है।
अन्ना हजारे के आंदोलन में भी यही वर्ग ज्यादा दिखाई दिया था और निर्भया आंदोलन में
भी नौजवान वर्ग की संख्या ज्यादा थी। यह वर्ग फेसबुक, ट्विटर और मोबाइल के माध्यम
से एकजुट होता है और सड़कों पर निकल आता है। इस वर्ग की चिंताएं भ्रष्टाचार मुक्त भारत, रोजगार, बुनियादी
ढांचा और औद्योगिक विकास बहुत ज्यादा है। उनकी सोच है कि भारत जैसा देश आखिर तमाम
संसाधनों के होने के बाद भी विकास की राह पर क्यों नहीं चल पा रहा है।
यदि भावनात्मक मुद्दे ही राजनीति का आधार होते तो नरेंद्र मोदी को गुजरात
के विकास मॉडल की चर्चा बार-बार करने की जरूरत नहीं पड़ती। वह सुशासन को अपना यूएसपी नहीं बनाते।
यदि भावनात्मक मुद्दे ही राजनीति का आधार होते तो नीतीश कुमार, नवीन
पटनायक, शिवराज सिंह और रमनसिंह जीतकर नहीं आते। लालू यादव बिहार में सत्ता से बाहर नहीं हुए होते। दिग्विजय सिंह 2003 में यह कहने के बावजूद नहीं हारते कि विकास से चुनाव नहीं जीते जाते। वर्ष 2007 के बाद करीब 66 फीसदी
सत्तासीन दलों ने वापसी की। करीब छह मुख्यमंत्रियों ने लगातार अगला चुनाव जीता।
यूपीए ने 2009 में लगातार दूसरा चुनाव सभी को आश्चर्यचकित करते हुए इसी वजह से जीता था कि डॉ. मनमोहन सिंह
को एक तरफ मध्यवर्ग व उद्यमियों का समर्थन मिला था और दूसरी तरफ उस गरीब वर्ग का
जिसके लिए वे कई कल्याणकारी योजनाएं लाए थे। युवा वर्ग को यह आश्वस्ति थी कि देश
की बागडोर एक कैरियरिस्ट अर्थशास्त्री के पास है और भारत निश्चित ही प्रगति करेगा।
वर्तमान में कोई भावुक मुद्दे नहीं हैं। लोग भावुक मसलों से ऊब चुके
हैं। वे अपने आसपास विकास के चिह्न देखना चाहते हैं। उसके सबूत देखना चाहते हैं।
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