शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

आप चुनाव में टिकट किसे दे रहे हैं?

       देश में राजनीति को स्वच्छ करने की बातें हो रही हैं, लेकिन राजनीति को स्वच्छ करना है तो टिकटों का बंटवारा सही होना चाहिए।  क्या राजनीतिक दल उन लोगों को टिकट दे रहे हैं, जो भारत में सुशासन ला सकते हों। 

     जयप्रकाश पाराशर 


   यह बात सही है कि देश के राजनीतिक नेतृत्व में विजनरी लोगों की जरूरत है,जिनके पास नए आइडिया हों, विकसित भारत का स्वप्न हो और कुछ कर गुजरने की हसरत हो। यह सब देश के इलीट और अमीर लोगों के पास ही नहीं है। साधारण लोगों में भी इन गुणों की उपलब्धता है, लेकिन पार्टीक्रेसी और पूंजीप्रधान चुनावों के कारण वे राजनीतिक व्यवस्था में अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं। पार्टियां प्रयास करें तो साधारण लोगों को राजनीतिक तंत्र में जगह बनाने में मदद मिलेगी और लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार आएगा। लिहाजा- 
  • सबसे ज्यादा टिकट किसानों व ग्रामीणों को दिए जाने चाहिए, क्योंकि देश में ज्यादातर जनसंख्या कृषि पर आधारित और गांवों में रहने वालों की है। यह संख्या कम से कम 50-60 फीसदी होनी चाहिए। किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि ये किसान 40-50 एकड़ से ज्यादा भूस्वामित्व वाले नहीं हों। ऐसे लोग जिंदगीभर किसान नेता बने रहते हैं जिनके परिवारों के पास 700-800 एकड़ जमीनें होती हैं। वही कृषि मंत्री बनकर फैसले लेते हैं। देश में छोटी जोत के किसान ज्यादा हैं।
  •  ग्रामीण भी ऐसे होने चाहिए जिनका समाज में योगदान हो। ग्रामीण ऐसे नहीं होने चाहिए जो जाति पंचायतों में बैठकर अंधविश्वासी या आदिम युग के फैसले करते हों। ऐसे ग्रामीणों को चुना जाए जिनके पास वैज्ञानिक नजरिया हो।
  • टिकटों के बंटवारे में दूसरी प्राथमिकता शिक्षकों, वकीलों, पत्रकारों, डॉक्टरों, अर्थशास्त्री, प्रोफेसर जैसे उन बुद्धिजीवियों को दी जानी चाहिए जिनकी छवि साफ है और जो अपने पेशे के साथ-साथ सामाजिक दायित्व का निर्वाह भी करते रहे हों। यह नहीं कि पत्रकारों के रूप में मीडिया हाउसों के मालिकों को चुन लिया जाए और डॉक्टरों के रूप में बड़े अस्पतालों के मालिकों को चुनाव कर लिया जाए।
  •   कई मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज चलाने वाले व्यावसायिक लाभ के लिए संस्थान खड़े करते हैं। इनमें से कई लोग ऐसे हैं जो पहले भूमाफिया थे या दूसरे स्रोतों से धन कमाकर मेडिकल कॉलेज खोल लेते हैं। ऐसे लोगों को टिकट बिलकुल नहीं मिलना चाहिए क्योंकि ये लोग बाआसानी शिक्षा-माफिया में बदल सकते हैं।
  •  वकीलों में ऐसे लोग हैं जो एक सुनवाई में खड़े होने की फीस दस-दस लाख रुपए लेते हैं। वकीलों में से उन लोगों को चुना जाना चाहिए जिनका सामाजिक सेवा में योगदान हो। 
  •  तीसरी प्राथमिकता स्कूलों, अस्पतालों, सहकारी संस्थाएं खड़ी करने वाले नेतृत्व, गैर सरकारी संगठनों के नेतृत्व को दी जानी चाहिए। समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को भी इसमें शामिल करना चाहिए।
  •  ऐसे छोटे कारोबारियों व उद्यमियों को टिकट देने चाहिए जो स्वच्छ कारोबार में हों और जिन्होंने उद्यम गढें हों। उन लोगों को कतई टिकट नहीं देने चाहिए जिनके कारोबार अस्वच्छ हों। यानी शराब, मेजर माइनिंग, ट्रांसपोर्ट और ठेकेदारी के कारोबार में लगे लोगों को कतई टिकट नहीं देने चाहिए। जो सरकारी ठेके लेते हैं, या सरकारी विभागों में सप्लायर का काम करते हैं, ऐसे लोगों को बिलकुल टिकट नहीं दिए जाएं, क्योंकि वे अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल दबाव डालकर कारोबार बढ़ाने में करेंगे और समाज को नुकसान पहुंचाएंगे।
  • अपराधियों व माफियाओं को टिकट से बिलकुल वंचित कर देना चाहिए। हत्या बलात्कार आदि के कई मामलों में एफआईआर के बाद भी टिकट नहीं मिलना चाहिए। जो लोग भले ही अपराधी नहीं हो लेकिन अपराधियों का इस्तेमाल राजनीति में करते हैं उनके प्रति भी सख्त रवैया अपनाना चाहिए। 
  • पेट्रोल पंप और गैस एजेंसियों के मालिकों को टिकट नहीं देने चाहिए। वे अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल करके सेवाओं को प्रभावित करते हैं और सामान्य लोगों को लाभ से वंचित करते हैं।
  • पब्लिक ट्रांसपोर्ट का काम करने वालों को टिकट नहीं देने चाहिए। ये लोग सार्वजनिक यातायात सेवा में राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल करके कंज्यूमर के साथ बुरा बर्ताव करते हैं, ट्रेफिक नियमों का उल्लंघन करते हैं।
  •  फिल्म कलाकारों, टीवी स्टार आदि को तब तक टिकट नहीं देना चाहिए जब तक राजनीति में उनका कुछ वर्षों का ट्रेक रिकार्ड नहीं हो। वो एक-दो चुनाव जीतने के बाद या तो राजनीति से बाहर हो जाएंगे या आम आदमी को समय नहीं देंगे। 

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