सूचना स्रोतों की लिंकिंग से सुधर सकती है शिक्षा की गुणवत्ता
जयप्रकाश पाराशर
मध्य प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा गंभीर संकट से जूझ रही है।
यूं तो यह कोई रहस्य नहीं है। लेकिन मैं पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजस्थान से लगी सीमा पर बसे सिरोंज के एक गांव सेमलखेड़ी में एनएनएस (राष्ट्रीय सेवा योजना) के एक शिविर में गया तो गांवों के बारे में छात्रों के अनुभव चौंकाने वाले थे। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारतीय छात्रों की काबिलियत को लेकर बिलावजह भयभीत हो रहे हैं। उन्हें चैन की नींद सोना चाहिए।
बेशक उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा एक उत्साही व्यक्ति हैं और इस तरह के शख्स हैं जो इस वास्तविकता से मुठभेड़ करना चाहेंगे।
पांचवीं और ककहराः
शिविर में एक छात्रा ने बताया कि गांव में बच्चे पांचवीं में पहुंच गए हैं लेकिन उन्हें ककहरा तक नहीं आता। वे किताब पढ़ नहीं सकते, कुछ लिख नहीं सकते। उन्हें गणित का हिसाब-किताब नहीं आता। शिक्षक स्कूल नहीं आते। आंगनबाड़ी वाले रोज-रोज आने लगेंगे तो विभाग बदनाम हो जाएगा। यह हर गांव की कहानी है।
जब दुनिया में सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है, पूरी धरती एक गांव बन रही है, तब इस मुल्क के भीतर दो मुल्क बन रहे हैं।
एक, जिसकी होड़ सूचनाओं के आदिम समाजों से है।
दो, जिसे लेकर बराक ओबामा भी चिंतित हो रहे हैं। वह अमेरिकी छात्रों की नींद उड़ा रहा है।
ओबामा और सेमलखेड़ीः
इस मुल्क की नीतियां बनाने वाले समझ नहीं रहे हैं कि शिक्षा का यह वर्गीय विभाजन कितने भयानक संकट को जन्म दे रहा है। जिस देश की शिक्षा व्यवस्था खुद ही दो तरह के नागरिक बनाती हो उस देश के संविधान में न्याय और समानता के शब्दों की हैसियत क्या होगी।
एक बच्चा है जिसकी पहुंच पलक झपकते ही दुनिया के नवीनतम सूचना स्रोतों तक है, दूसरा बच्चा सेमलखेड़ी का है जो पांचवीं (कम से कम दस ग्यारह साल का तो है ही) में आने के बाद भी ककहरा नहीं जानता। दुर्भाग्यवश, हमारे देश में ऐसी सेमलखेड़ियां बहुत ज्यादा हैं। सौ फीसदी साक्षर कहलाने वाले केरल में भी इस तरह के उदाहरण सामने आए हैं।
मेरा मंत्रियों, नेताओं और आईएएस अधिकारियों से आग्रह है कि वे अपने बच्चों को इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं, जिन्हें वे चलाते हैं।
सूचना का दुष्चक्रः
यह एक अजीब सा दुष्चक्र है। लोग इसलिए गरीब हैं कि उन तक सूचनाएं नहीं पहुंच रही हैं। वे सूचनाएं इसलिए हासिल नहीं कर सकते क्योंकि वे गरीब हैं।
उनके पास सूचनाएं नहीं हैं, इसलिए उन्हें अपने हक नहीं मालूम। वे एक ऐसे सरपंच को बीस साल तक चुन रहे हैं जो भ्रष्ट है।
लोगों के पास पैसा नहीं है इसलिए वे अखबार नहीं खरीद सकते, टीवी नहीं देख सकते और इंटरनेट एक्सेस नहीं कर सकते।
नई रणनीति होः
अब सरकारों को लोगों को सूचित करने और बच्चों के पढ़ने-लिखने के परंपरागत ढांचे में बदलाव करना चाहिए।
आयरलैंड के एक सांसद थे सीन मैकब्राइड। 1979 में यूनीसेफ ने उनकी अध्यक्षता में एक आयोग का गठन यह जानने के लिए किया कि विकासशील या अविकसित देशों में सूचना के प्रवाह की क्या स्थिति है। मैकब्राइड ने पाया कि विकासशील देशों के आर्थिक विकास नहीं कर पाने का असल कारण यह है कि वहां सूचना का मुक्त प्रवाह नहीं है।
अच्छी खबर यह है कि 2010 ऐसा नहीं है। अब सूचना हासिल करने के अनेक स्रोत हैं। केबल टीवी, इंटरनेट, वर्चुअल क्लास, वीडियो आन डिमांड, डायरेक्ट टू होम जैसे नए माध्यमों का उपयोग सरकारों को करना चाहिए।
दुनिया की नवीनतम पाठ्यसामग्री बच्चों तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है। मल्टीमीडिया की विज्ञान और गणित की सामग्री के अलावा डिस्कवरी व नेशनल ज्योग्रफिक का कंटेंट उच्च कोटि का है। यह किसी भी पाठ्यपुस्तक के मुकाबले बेहतर है। यह शिक्षा की गुणवत्ता को आसानी से सुधार सकता है।
रचनात्मक नजरियाः
कई स्वयंसेवी संगठनों ने ऐसे प्रयोग किए भी हैं। यह काम मामूली लागत में किया जा सकता है। यह कोई बड़े निवेश की मांग नहीं करता। बस रचनात्मक नजरिया चाहिए।
एशिया में इंटरनेट के जाल में अकेले चीन की हिस्सेदारी 48.8 फीसदी है। पर्याप्त ब्राडबैंड होने के बाद भी भारत की केवल 7 फीसदी जनसंख्या इंटरनेट से जुड़ पाई है।
सरकार नजरिए में थोड़ा बदलाव करे और काम के ढंग को बदल दे तो मध्य प्रदेश के गांवों के बच्चे भी दुनिया से होड़ करते नजर आएंगे।
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