नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और जमीन कारोबारियों के बीच एक गठजोड़ ने मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब वक्त आ गया है कि रीयल एस्टेट या जमीन जायदाद के नियंत्रण के लिए राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र नियामक बनाया जाए, जिसे नीतियों के निर्माण और मानिटरिंग में अहम भूमिका दी जाए। उसे राजनीतिक हस्तक्षेप से भी मुक्त रखा जाए।
जयप्रकाश पाराशर
राजनीति अगर छवियों का धंधा है तो जमीन का धंधा मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की छवि बिगाड़ रहा है। शिवराज सरकार की छवि पिछले कुछ महीनों में ऐसी बनी है कि उसके नेताओं व मंत्रियों का मुख्य व्यवसाय जमीन की खरीद-फरोख्त, बिल्डर या डेवलपर होना है। नेता और बिल्डर या कालोनाइजर की छवियां एकदम गड्डमड्ड हो गई हैं। एक तरफ राजनीति अगर जमीन कारोबारियों की मदद करती दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ जमीन के कारोबारी भी सियासत के साथ नत्थी दिखाई देते हैं। घोटाले उजागर होते हैं, जांच आयोग बनते हैं और चुनावों के साथ विदा हो जाते हैं।
जगतपति कमेटी की रिपोर्ट से लेकर दिग्विजय सिंह सरकार तक के जमीन घोटालों पर एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी राजनीतिक शख्सियत को सजा दी गई हो।
धन की गंगोत्री
उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पर इंदौर में जमीन घोटाले के आरोपों ने एक बार फिर इस सवाल को उठाया है कि दोषी लोग क्यों बच निकलते हैं। यह नेताओं, कारोबार और अपराध का एक अघोषित लेकिन अपवित्र गठबंधन है, जो सत्ता में आते ही धन की गंगोत्री को दोनों हाथों से उलीचने में जुट जाता है।
कैलाश विजयवर्गीय के मामले में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का शीर्ष नेतृत्व एक बड़ी उपयोगी किस्म की चुप्पी साधे हुए है।
मास्टरप्लान का धंधा
मास्टरप्लान भी हमेशा विवादों के घेरे में रहे हैं। उसका प्रमुख कारण है कि मास्टरप्लान शहरवासियों की सुविधाओं या शहर को बेहतर जगह बनाने के लिए नहीं तैयार किए जाते, बल्कि मास्टरप्लान का मुख्य ध्येय होता है किसी बिल्डर या डेवलपर को लाभ पहुंचाना। सूचनाएं पहले से लीक हो जाती हैं। लिहाजा नेताओं के पसंदीदा या कृपापात्र लोग पहले ही जमीनें खरीद लेते हैं। जमीनों के इस्तेमाल (लैंड यूज) भी अपने लाभ को ध्यान में रखकर बदले जाते हैं। बल्कि यह मानने वालों की बड़ी तादाद है कि मास्टर प्लान बनाए नहीं जाते, बेचे जाते हैं।
झील शहर की आत्मा
इस बार भी यही हुआ कि बिल्डरों-नेताओं के गठबंधनों ने झील के कैचमेंट एरिया की जमीनें खरीदीं। उसी हिसाब से मास्टरप्लान में लैंड यूज को बदल दिया गया। झील जाए भाड़ में और शहर जाए जहन्नुम में। इस पाप में सब शामिल हैं। पार्टियां कोई मायने नहीं रखतीं, यह एक मुसलसल फिनोमिना है कि जो भी सत्ता में होता है, वह एक जैसा व्यवहार करता है। इस मामले में सबकी चाल एक जैसी होती है, चरित्र में कोई अंतर नहीं होता और आम आदमी जब उन चेहरों को देखता है तो फर्क नहीं कर पाता। सारी रिपोर्टें जगतपति की रिपोर्ट लगती हैं। उनकी कार्रवाईयां भी एक जैसी।
इसलिए जब मध्य प्रदेश के कई बिल्डरों पर आयकर के छापे पड़े और उनकी सत्ताधारी दल के नेताओं के साथ रिश्तेदारियों के किस्से सामने आने लगे तो उनके बचाव में उमड़ने वालों की भी कोई कमी नहीं थी।
पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा है कि पूरी सरकार ही जमीन के किसी बड़े कारोबारी में बदल गई है। इन घटनाओं से निश्चय ही भाजपा की राजनीतिक जमीन को भारी नुकसान पहुंचा है। एक के बाद एक भ्रष्टाचार की खबरों के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे असहाय नेता के रूप में उभरे हैं, जो फैसला कहीं ओर से होने का इंतजार कर रहा है।
कारोबारियों, नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की यह उद्यमशील मिलनसारिता आम आदमी को परेशान कर रही है कि उसके लिए आखिर कौन काम कर रहा है।
रेगुलेटरी बना दो
वास्तव में अब यह समस्या किसी मंत्री को हटा देने के साथ खत्म होने वाली नहीं। यह राजनीतिक डीएनए का खोट है। फिर भी एक हल दिखाई देता है। जमीन-जायदाद के मामलों का एक स्वतंत्र नियामक (रेगुलेटरी अथारिटी) बनाना चाहिए। यह दूरसंचार के नियामक ट्राई की तरह हो सकता है। केंद्र सरकार इस मसले पर विचार कर रही है लेकिन इसकी असली जरूरत राज्यों को है। इन रेगुलेटरी अथारिटी को तय करने दिया जाए कि कौन सी जमीन पर शहर बसाया जाए, कीमतें कैसे तय हों, कृषि भूमि और जलाशयों की जमीनों की सुरक्षा कैसे की जाए। उसका कामकाज ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी बनाया जाए और सभी पक्षकारों की शिरकत नीतियां बनाने में होनी चाहिए।
इस खूबसूरत शहर को बचाओ
भोपाल जैसे शहरों पर देशभर के भूमि कारोबारियों और बिल्डरों की नजर है। उसके दो कारण हैं। यहां जमीन की कीमतें अभी कम हैं और दूसरा यह शहर हरा-भरा है। झीलें इसका जलतत्व है। जो लोग चंडीगढ़ और पूना में जमीनें नहीं खरीद सकते वे भोपाल में घर बनाना चाहते हैं। इसलिए यहां हजारों पेड़ काटकर बहुमंजिला इमारतें खड़ी करने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। झीलों के कैचमेंट एरिया को ऐसे लोग खरीद रहे हैं, जिनका नीतियों पर दबदबा है। लोग पूछ सकते हैं कि आखिर पहाड़ किसकी जायदाद थे, उन पर कॉलोनियां किसने बसाईं। क्या बिना राजनीतिक और प्रशासनिक पार्टनरशिप के हरे भरे पहाड़ों को बिल्डरों के जरिए कालोनियों में बदलने का काम किया जा सकता था?
इस शहर के निवासियों को नेताओं-बिल्डरों की लिप्साओं के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। वास्तव में यह हम आम लोगों की लड़ाई है। झील और जंगलों का नष्ट होना अगर कोई खतरा है तो हमारे नेता उस खतरे से बाहर हैं।
bahut badhiya
जवाब देंहटाएंExcellent Critique!
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