सोमवार, 19 अप्रैल 2010

उनके लिए लोगों का दुख भी 'फनी' है

सूचनाएं कभी सरकारों की मोहताज नहीं होतीं

जयप्रकाश पाराशर

पिछली बार जब मैंने मध्य प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा के खराब हालात और गांववासियों की सूचना-दरिद्रता के बारे में लिखा तो कुछ लोगों ने इस आलेख को 'फनी' बताया। मेरे पास एक-दो ई-मेल ऐसे भी आए कि गांव के स्कूलों में छत और टायलेट नहीं है, पीने का पानी नहीं और मैं बौडम इंटरनेट लाने की बात कर रहा हूं गोया मुझे जमीनी हकीकत का कुछ खयाल नहीं और किसी आसमानी-सुलतानी वंडरलैंड में भटक रहा हूं।

जमीनी हकीकत यह है कि मैं राजगढ़ जिले के 1500 की आबादी वाले कांसरोद गांव के एक सरकारी स्कूल में पांचवीं तक पढ़ा हूं, जहां हम बच्चे ही स्कूल के परकोटे से गाएं भगाते थे, दरवाजा खोलते, हम ही फटी हुई टाटपट्टियां बिछाते और सुरसुती-सुरसुती मेरी मां गाकर सरस्वती की उपासना करते। उन्हीं लोगों में से एक जज, एक-दो प्रोफेसर और मेरे जैसा फालतू पत्रकार बन गए। खास बात यह थी कि हमारे शिक्षक बरसाती नदी की बाढ़ में तैरकर भी स्कूल आते थे। कोई शिक्षक बाढ़ के बावजूद और कीचड़ में चलकर स्कूल आए तो कौन बच्चा होगा जो स्कूल नहीं जाना चाहेगा। ज्ञान की वह ललक तो मध्यान्ह भोजन भी पैदा नहीं कर पा रहा। नामांकनों की बढ़ती संख्या का श्रेय मध्यान्ह भोजन के बिल को दिया जाए तो अतिरेक नहीं है।

लैंडलाइन बनाम मोबाइल

यह मानने वाले कौन लोग हैं कि जब स्कूल की छत नहीं है तो इंटरनेट कैसे पहुंच सकता है? ये वही लोग हैं जो मानते हैं कि जहां लैंडलाइन फोन नहीं जा सकता वहां मोबाइल कैसे जा सकता है। अगर साधारण मोबाइल नहीं जा पाया तो 3-जी कैसे जा सकता है। चुनांचे सबसे पहले वहां लैंडलाइन फोन लगाइए, फिर आगे की बात करेंगे। भाई, टेक्नोलाजी विचार की गति से बदल रही है।

मैं एक बार फिर कहना चाहता हूं कि लोगों की तकदीर तभी बदल सकती है जब उनकी पहुंच सूचनाओं तक ले जाई जाए और सूचनाओं को खींचकर उन तक लाया जाए। वे अपनी तकदीर खुद बदल लेंगे। उन्हें पता तो चले कि दुनिया कहां जा रही है, राजेंद्रसिंह कैसे पानी बचा रहे हैं, सैम पित्रोदा कैसे साधारण आदमी से दुनिया की शख्सियत बन जाते हैं, कृषि उपजों की असली मलाई कैसे बिचौलिए खा जाते हैं, पुलिसकर्मी के अत्याचारों की शिकायत उन्हें किससे करनी चाहिए।

तकनीक जितनी तेजी से बदल रही है और उसकी लागत भी उसी रफ्तार से घट रही है। मुल्क में बड़ी मात्रा में बैंडविड्थ पड़ा है। जो काम अब तक एक कंप्यूटर करता रहा है, अब वही काम एक मोबाइल करेगा। विश्वास करें, अगर यह आम आदमी तरक्की के सूत्र जान गया तो वह स्कूलों पर छत तान देगा, सदानीरा बहा देगा और धन का प्रवाह भी गांवों की ओर मुड़ जाएगा। सरकारें धरी रह जाएंगी।

यह भी तय समझिए कि यह काम आप नहीं करेंगे तो खुद-ब-खुद होगा। शहरों के बाजार संतृप्त हो जाएंगे तब कंपनियां गांवों की ओर मुड़ेंगी। वे खुद गांवों तक सूचनाओं का रथ लेकर जाएंगी। अपने उत्पादों को कस्टमाइज करेंगी, सस्ता बनाएंगी और गांवों में अपना बाजार खड़ा कर देंगी। माफ करना इस देश में आईटी की क्रांति सरकार ने नहीं की, इस देश के शिक्षा संस्थानों और कंपनियों ने की है।

किसी का दुख, किसी का मजाक

जिन लोगों को समेलखेड़ी के प्राथमिक स्कूल की असलियत फनी लग रही है, वे अरब के उन रईसों की तरह हैं जो गरीब मुल्कों के बच्चे ऊंटों की पीठ पर बैठाते हैं और बच्चों की चीख-पुकार से दिल बहलाते हैं।

इस देश में किसी का दुख भी कुछ लोगों का मनोरंजन है।

स्कूलों में शिक्षक नहीं पहुंचते हैं और बच्चों को ककहरा नहीं आता है तो इसमें क्या फनी है?

क्या यह फनी है कि नेताओं और अफसरों के बच्चे उन सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते जिन्हें वे चलाते हैं?

अथवा यह फनी है कि आंगनबाड़ी में करोड़ों खर्च बताए जाते हैं लेकिन कर्मचारी गांवों में रोजाना नहीं पहुंचते, लोग कुपोषण के कारण गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं या मर रहे हैं? इसमें भी लोगों को कुछ फनी लगता है, तो उन्हें अपने ऊपरी माले पर संदेह करना चाहिए। मुझे उनका होना फनी लगता है।

शिक्षकों की परेशानी

मुझे कुछ शिक्षकों ने कहा कि सिर्फ उन्हें ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उन पर बहुत सारे गैरशिक्षकीय काम थोपे जा रहे हैं। जनगणना से लेकर पशुगणना तक। जब से शिक्षकों को पंचायतों के तहत किया गया है, उनके कामकाज में हस्तक्षेप बढ़ गया है। वे अनपढ़ जनप्रतिनिधियों के सामने भी अपना आत्मविश्वास खो बैठे हैं। लागत कम करने के क्रम में वे शिक्षाकर्मी बन गए। उन्हें इतना कम पैसा मिल रहा है कि सबसे अच्छे लोग शिक्षक नहीं बनना चाहते।

चलते-चलते

इस देश के इलीट में गांवों के प्रति इतना हेय भाव है कि एक महानगरीय स्वनामधन्य पत्रकार ने अपने कॉलम में लिखा कि जो लोग कंपनियों में सफल नहीं हो पा रहे हैं, उन्हें गांवों में, वहां की स्कूली शिक्षा में काम करना चाहिए। मैं उनकी जानकारी में लाना चाहता हूं कि उन्हें मुंबई में अखबार अगर एक लाख रुपए दे रहा है तो गांव में उन्हें दस हजार रुपए भी नहीं मिलेंगे।

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