गुरुवार, 17 जून 2010

मीडिया कर्मः 7 जून और उसके बाद

सात जून को गैस त्रासदी पर फैसला आने के बाद क्या भारतीय मीडिया में कुछ बदल गया है? क्या उसके केंद्र में अब वो गरीब लोग भी आ गए हैं, जो मोबाइल, कारें, एलसीडी या लैपटाप नहीं खरीद सकते?

जयप्रकाश पाराशर

कुछ लोग मानते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी पर बवाल भोपाल के तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह के बयान से शुरू हुआ। कुछ लोगों का ख्याल है कि यह मसला चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) मोहन पी तिवारी की अदालत का फैसला आने के बाद मीडिया ने शुरू किया। मीडिया ने उन तमाम लोगों को खंगाल डाला जो कहीं न कहीं इस त्रासदी से जुड़े हुए थे। लिहाजा लोगों को पता लगा कि 26 साल पहले वास्तव में क्या साजिशें हुई थीं।

यह मानने वालों की भी कमी नहीं है कि गैस त्रासदी अगर 2010 के मीडिया युग में हुई होती तो न वारेन एंडरसन भाग पाता और न फैसले में इतना विलंब होता। इसमें कोई शक नहीं कि गैस पीड़ितों के साथ हुए छल की परतें उधेड़ने में भारतीय मीडिया ने अद्भुत काम किया है। जब देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका गूंगे-बहरों में बदल गए थे, तब मीडिया ने उस लड़ाई का जिम्मा अपने ऊपर लिया।

अलबत्ता, इस पूरी घटना में कोई 1857 हुआ तो वह उसी समय हो गया था जब लोग निषेधाज्ञा (धारा 144) का उल्लंघन करके भी अदालत के सामने डट गए थे। जब उन्होंने देखा कि वे 26 साल से जिस फैसले का इंतजार कर रहे थे, जिस मामले में 25,000 लोग जानें गंवा बैठे हैं, लाखों लोग बीमारियां पाले घूम रहे हैं, उसमें दोषियों को केवल दो-दो साल की सजा सुनाई गई है और वारेन एंडरसन सजा से एकदम बाहर है, तो वहां एक बगावत हो चुकी थी। यही वह समय था जब मीडिया उनके साथ हो गया।

यह फैसला पहली नजर में ही इतना अन्यायकारी और अमानवीय दिखाई पड़ता है कि देश के गरीब हों या अमीर, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, या विशाल मध्यमवर्ग हर किसी को हिला गया। एक संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पर चोट हुई थी। लोगों को पहली बार अहसास हुआ कि उनका सिस्टम कितना बीमार, असंवेदनशील और कमजोर है।

मीडिया का निर्भय-नादः

यह देखना सुखद था कि भूत-प्रेत और टोने-टोटकों की गिरफ्त में फंसे चैनल हों या सोशियो इकानामिक कैटेगरी-ए 1 व ए 2(उच्च आय वर्ग) के पूजा-पाठ में लगे अखबार, वे देर लगाए बिना गरीबों की लड़ाई में कूद पड़े।

टाइम्स नाऊ ने जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एएम अहमदी से पूछा कि उन्होंने एनडी जयप्रकाश की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी, तो उनके पास इसके सिवा कोई जवाब नहीं था कि उन्हें कुछ याद नहीं।

हर टीवी चैनल, वह सहारा समय हो या आईबीएन7, सबने तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह, पायलट हसन अली, मोहन तिवारी से लेकर मौजूदा नेताओं तक को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अखबारों की आक्रामकता भी हैरान करने वाली थी। जहां लोग नगर निगम कमिश्नर के खिलाफ लिखने से बचते हों, वहां राजीव गांधी से लेकर मौजूदा सरकार तक को कठघरे में खड़ा करना क्या आपको मीडिया के रुख में बदलाव नहीं लगता?

केंद्र में यूपीए सरकार का लिहाज किए बिना राजीव गांधी का नाम हैडलाइन में छापना कोई कम साहस का काम नहीं था। अखबारों में इस तरह के साहस कम ही किए जाते हैं। व्यक्तिगत राग-द्वेष या लाभ-हानि देखकर भले ही नेताओं के खिलाफ अभियान चलाए जाते हों लेकिन अवाम के लिए बैठे ठाले कोई पंगा नहीं लेता।

आजकल एसईसी से नीचे का आदमी ब्लागरों के भरोसे छोड़ दिया गया है।

अखबारों में भी बड़ी खबरें भले ही ब्रेक नहीं हुई हों लेकिन उन्होंने हर मसले को छुआ है, वो गैस राहत अस्पताल हों, इलाज हो या नेताओं की बयानबाजियां हों, झूठ हों या दोहरे चरित्र।

जंग अभी बाकी है दोस्तः

मीडिया के लिए अभी जंग खत्म नहीं हुई है। कांग्रेस में आंतरिक सेंसर घोषित हो चुका है, वहां जिद्दी और लड़ाकू लोग भी मौनी बाबाओं में बदल चुके हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार नए पैकेज की तैयारी कर रही है। वह विनिवेश और स्पेक्ट्रम बेचकर जो पैसा कमाने वाली है, उसका एक हिस्सा भोपाल पहुंचने वाला है। इसलिए मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ गई है।

अभी तो उस व्यवस्था की खाल उधेड़नी बाकी है, जिसमें हजारों छिद्रों से बहकर करोड़ों की राहतें सरकारी बाबुओं, अफसरों, फर्जी एनजीओ, छुटभैये नेताओं और बाहुबलियों के खातों और घरों में पहुंच जाती है।

उन अस्पतालों का इलाज करना बाकी है, जहां इलाज के नाम पर कर्मकांड चल रहा है। जहां सरकार की ओर से दी जाने वाली दवाएं सामने वाले मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती है। जिनके अहाते में ऐसे एजेंट टहल रहे हैं जो किसी पीड़ित के नाम पर किसी और का इलाज करा रहे हैं।

उन लोगों को तलाशना बाकी है, जिन्होंने गैस कांड में सब कुछ खो दिया लेकिन उनके नाम कहीं नहीं हैं। न सरकार के रजिस्टर में और न नेताओं की समृति में।

हमने भी उनके लिए कुछ नहीं किया तो बेचारों को गैस त्रासदी के स्मारक से काम चलाना पड़ेगा।

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